August 24, 2020

एक अफ्रीकन पकवान जो मुझसे खाया नहीं गया

 

भोजन के मामले में मैं विश्ववादी (Cosmoplitan) रहा हूँ और सभी किस्म का भोजन खा लेता हूँ। बल्कि मुझे विभिन्न देशों के स्थानीय भोजन आजमाने का शौक है। मैं जब भी विदेश में होता था, कभी भारतीय रेस्टोरां तलाश नहीं करता था, हमेशा ऐसे रेस्टोरां जाया करता था जहां विशुद्ध स्थानीय भोजन मिलता हो और प्रतिदिन नई डिश चखा करता था। इस मामले में जापान में बहुत सुविधा थी। वहाँ  रेस्टोरां या स्टूडेंट कैफेटेरियाओं में एक शो केस में उस दिन बने पकवान सजाये हुए होते थे, उनका जापानी भाषा में नाम और साथ एक विशेष नंबर भी दिया होता था। नंबर कंप्यूटर से हिसाब रखने की सुविधा के लिए दिया गया होता था। साथ में प्रत्येक डिश का मूल्य भी लिखा होता था। आप वहाँ से अपनी पसंद की डिश चुन कर उनके नंबर अंदर काउंटर पर कैशियर को बता देते और वह पैसे लेकर आपको कूपन दे देता था जिसको आप आगे जाकर फूड काउंटर पर दे देते और आपको एक ट्रे में वह सब मिल जाता था। मैं जितने दिन वहाँ रहा हर रोज नया मीनू चुना करता था। 

जापानी लोग सी फूड का बहुत प्रयोग करते हैं। वहाँ मैंने औक्टोपस भी चखा। वहाँ मछली की एक ऐसी जाति भी होती है, जिसे वे कच्चा खाते  हैं, सलाद की तरह और शायद यह काफी महंगी होती है क्योंकि इसे मैंने विशेष आयोजनो पर ही परोसे जाता देखा।

       अब आते हैं असली बात पर। जैसा कि मैं अकसर बताता रहता हूँ
, मैंने दो वर्ष पश्चिमी अफ्रीका के देश लाइबेरिया में भी बिताए हैं। अफ्रीका भारत से बिलकुल भिन्न है। वहाँ के लोग अलग हैं,रस्मों रिवाज अलग हैं, सभ्यता अलग है और खान पान भी हमसे बिलकुल अलग है। यहाँ आपको लगता है कि आप सचमुच ही विदेश में हैं।


पश्चिमी अफ्रीका की स्नेल, जिसे वे लोग खाते हैं 

       एक दिन मैं अपने एक अफ्रीकी मित्र के घर पर गया। यहाँ मैं एक बात यह भी बताना चाहता हूँ कि लाइबेरियन लोग बहुत ही हौस्पिटेबल होते हैं और उन में बाँट कर खाने का कल्चर है। अगर उनके यहाँ खाना खाते वक्त कोई आ जाये तो वे इसे शुभ मानते हैं। मैंने सुना है कि लगभग सारे पश्चिमी अफ्रीका में यही रिवाज है। मैं जब अपने मित्र के यहाँ पहुंचा तो वे खाना खाने की तैयारी कर रहे थे। क्योंकि मैं वहाँ अकेला रहता था और मैंने भारत में कभी खाना नहीं पकाया था, इसलिए मेरा खाना जुगाड़ ही हुआ करता था। इसलिए मैं बहुत बार अपने अफ्रीकन मित्रों के यहाँ जान बूझ कर भी खाने के समय पहुंचा करता था।

       मेरे मित्र की पत्नी मुझे देख कर बहुत प्रसन्न हुई और बोली कि आप उचित समय पर ही नहीं बल्कि उचित दिन पर आए हैं। आज मैं आपको एक बहुत ही विशेष पकवान खिलाऊंगी। मैंने पूछा कि आज ऐसी क्या विशेष चीज़ बनी हैं। इस पर वह बोली, आज हमारे यहाँ स्नेल (snail) बनी हैं। मैं सुन कर सन्न रह गया। मुझे तब तक यह पता नहीं था कि अफ्रीका में या संसार में अन्य कहीं स्नेल भी खाई जाती हैं। मुझे तुरंत बरसात के मौसम में हमारे यहाँ पाई जाने वाले स्नेलों यानि फीहलों की याद आ गई, जिनको देख कर हमे लोगों का मन घृणा से भर जाता है। मेरे मुंह से एक दम इंकार निकल गया और मैंने कहा कि नहीं मैं स्नेल नहीं खा सकूँगा।


हमारे यहाँ पायी जाने वाली स्नेल, जिसे स्थानीय भाषा में फीहल कहते हैं 

       वे लोग बहुत हैरान हुए। क्योंकि वे लोग जानते थे कि मैं अफ्रीकन खानों का शौकीन था और नई नई चीज़ें खाने की ताक में रहता था।  अब मैं इनको अपने मन की स्थिति कैसे समझाता। मेरे मित्र की पत्नी ने मुझे समझाया कि स्नेल तो वहाँ का बहुत विशेष और महंगा भोजन है क्योकि स्नेल बाज़ार में रोज़ नहीं मिला करतीं। संयोगवश साल में एकाध बार मिल जाती हैं। और आज तो यह बहुत ही सुखद संयोग है कि हमारे घर में स्नेल पकी हैं और उसी दिन खाने के समय हमारे घर मेहमान भी आ गया। पर मुझे अपने यहाँ की फीहालों की याद आ रही थी और उनका ध्यान आने से उबकाई आनी शुरू हो गई थी। व लोग मेरी इंकार पर बहुत हैरान थे और बार बार मुझे समझा रहे थे। फिर मेरे मित्र की पत्नी रसोई में गई और पतीली उठा कर मुझे दिखाने लगी। वैसे तो उसमें कोई ऐसी बात नहीं थी, ऐसा लग रहा था जैसे अपने यहाँ बनी कलेजी के टुकड़े हों, पर मेरे दिमाग़ पर वह फीहलों की तस्वीर ऐसी बुरी तरह छा गई थी, कि मैं हाँ कर ही नहीं सका, हालांकि यह एक तरह मेरी धृष्टता ही थी और मुझे इसका अफसोस भी हो रहा था।

       तो यह थी वो डिश जिसे मैं उदार सर्वभक्षी विश्ववादी न खा सका।

       इसके अतिरिक्त मैं एक और डिश जो मैं नहीं खा सका
, वह थी मेंढक, पर वो किस्सा फिर कभी।                

July 23, 2020

ये मेरी माताजी के ब्वाय फ्रेंड हैं


यह दुनिया वास्तव में बहुत विविधता से भरी है। यहाँ बसने वाले इन्सानों के न केवल रंग रूप अलग हैं, पर सामाजिक रीति भी उतने ही अलग हैं। यहाँ मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। अँग्रेजी वाक्य ,my mother’s boy friend” का साधारण शब्दों में क्या आप ऐसा नहीं कहेंगे, “मेरी माँ का यार”। हमारे समाज में यह एक एक बहुत ही भद्दी और गंदी गाली है। अगर आप किसी को “तेरी माँ का यार” कह दें तो झगड़े और मार पीट की नौबत आ सकती है।
मैं और मेरे कॉलेज के सहयोगी

            आप विश्वास नहीं करेंगे की सारी दुनिया में ऐसा नहीं है। जब मैंने मोनरोविया के अत्यंत एक सम्मानित परिवार की महिला के मुंह से ये शब्द सुने, तो मैं सचमुच चौंक गया। खैर कहानी कुछ इस तरह है। उन दिनों मैं मोनरोविया के कृषि और वानिकी के कॉलेज में पढ़ाता था। एक दिन कॉलेज में मेरी एक महिला शिक्षक सहकर्मी ने मुझे अपने घर आने का निमंत्रण दिया जो मैंने बहुत खुशी से स्वीकार कर लिया।  वास्तव में, मैं हमेशा स्थानीय लोगों के घर परिवारों में जाने का और इनसे मेल जोल बढ़ाने का इच्छुक रहता था। मुझे उनके रहन सहन और सामाजिक रीतिरिवाज जानने में बहुत दिलचस्पी रहती थी। लाइबेरिया के लोग (मुझे बताया गया था कि अन्य पश्चिम अफ्रीकी देशों  के लोग भी) बहुत मिलनसार और मेहमाननवाज थे। वे शुरू शुरू में तो किसीअश्वेत को अपने घर ले जाने में अवश्य झिझकते पर शीघ्र ही उनकी झिझक, विशेष कर भारतीयों से, दूर हो जाती थी।  मैं अपने प्रवास के कुछ सप्ताहों के अंदर कई अफ्रीकी परिवारों से घुल मिल गया था।
एक लाइबेरियन मित्र परिवार के साथ मैं  

जब हम उसके घर पहुँचे तो मुझे उसने अपने घर के ड्राइंग रूम में बिठाया। धीरे धीरे परिवार के अन्य सदस्य भी वहाँ आ अगाए। उस देश में संयुक्त परिवार की प्रथा काफी प्रचलित थी इसलिए एक परिवार में कई कई सदस्य होते थे। मेरी महिला सहयोगी का नाम मारथा ब्लाह था और वह होम इक्नॉमिक्स की प्राध्यापिका थी। फिर उसने एक-एक करके अपने परिवार के सदस्यों से  मेरा परिचय कराना शुरू किया। उसकी मां, पचास पचपन वर्ष की रही होगी। उसकी माँ के बगल में एक वृद्ध बैठा था। मैंने मार्था से इस सज्जन के बारे में पूछा। मेरे इस सवाल से पहले तो थोड़ा सकपका गई पर फिर कुछ सोचकर बोली कि ये मेरी माता जी के ब्वाय फ्रेंड हैं।
अपनी लाइबेरियन सहेलियों के साथ मेरी पत्नी  पुष्पा 

            मुझे उसके इस जवाब से काफी हैरानी हुई क्योंकि मैंने इस रिश्ते में दिया गया परिचय, वह भी अपनी माँ के संबंध में, मैंने अपने जीवन में पहली बार सुना था।
            उस देश में आए मुझे अभी दो तीन ही महीने हुए थे। मेरे वहाँ काफी मित्र बन गए थे और मेरा बहुत अफ्रीकन घरों में आना जाना हो गया था। इसलिए इस प्रकार के अचंभे मुझे अक्सर होते रहते थे। बाद में मैं उन लोगो के रहन सहन और सामाजिक रीति रिवाजों का अभ्यस्त हो गया था।
            असल में अफ्रीका भारत से बहुत ही अलग है। अमरीका और योरोपीय देश भी हम भारतीयों को इतने भिन्न नहीं लगते जितना अफ्रीका। यहाँ का सब कुछ यानी लोग, जीव जन्तु, पेड़ पौधे , जलवायु ही अलग नहीं है, पर सामाजिक नैतिकता के मापदंड भी हमसे बहुत अलग हैं। 
            उनके समाज में पुरुष स्त्री सम्बन्धों में बहुत ही स्वच्छंदता है। हर पुरुष की कोई नारी और हर नारी का कोई न कोई पुरुष साथी होता है। अगर साथी विवाहित है तो वह पति या पत्नी कहलाएगा और यदि अविवाहित है तो ब्वाय या गर्ल फ्रेंड। इसके लिए उम्र की भी कोई सीमा नहीं है। न ही इस बात की कोई शर्म या निंदा होती है। हर किसी का कोई “साथी” अवश्य होना चाहिए। यह सामाजिक रूप से स्वीकृत है।  

July 18, 2020

1989 का मास्को – जो मैंने वहाँ क्या देखा और रूस के बारे में जो मेरे भ्रम टूटे


मास्को कभी मेरा ड्रीम शहर हुआ करता था। यह 1960-61 की बात है। तब मेरी उम्र 21-22 साल थी और मैं M. Sc. का छात्र था। मेरे पिता जी उन दिनो बिलासपुर में कार्यरत थे और पुराने बिलासपुर शहर में में रहा करते थे। हमारा मकान सांढू के मैदान में बस स्टैंड के साथ था। नया बिलासपुर अभी बनना ही शुरू हुआ था। मैं जब भी मुझे समय मिलता, बिलासपुर आ जाया करता था। हमारे क्वार्टर के नजदीक ही मियां गजेन्द्र सिंह की कोठी थी जिसमें स्थानीय कम्युनिस्टों का जमावड़ा लगा रहता था। वहाँ हिमाचल में कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक नेता प्रोफेसर कामेश्वर पंडित भी आते रहते थे। मेरा भी उन लोगों में उठना बैठना शुरू हो गया था जिसके परिणाम स्वरूप मुझ इस विचारधारा का प्रभाव पड़ना शुरू हो गया। पास में ही डिस्ट्रिक्ट लाइब्रेरी भी थी। वहाँ कम्यूनिज़्म पर यशपाल तथा कुछ अन्य लेखकों की पुस्तकें भी पढ़ीं। इस सब का नतीजा यह हुआ कि मैं अपनी ओर से पक्का कम्युनिस्ट बन गया। जब शिमला जाता, तो फे लॉज में ट्रांसपोर्ट वर्करों की यूनियन में रुका करता। रूस और मास्को मेरे लिए तीर्थ स्थान जैसे हो गए थे और वहाँ की यात्रा करना मेरे बहुत से सपनों में एक हो गया था।
            यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चला। पर बाद में उम्र और अनुभव के साथ विचार बदलते गए। मुझे दो सप्ताह चेकोस्लोवाकिया
, जब यहाँ समाजवाद था, बिताने का भी अवसर मिला और वहाँ के हालात भी देखे। इस तरह धीरे धीरे कम्यूनिज़्म या समाजवाद के बारे में मेरे विचार बदलते गए।
            1989 में मुझे मास्को जाने का अवसर मिला। यह वह समय था जब वहाँ कम्युनिज़्म था। रूस को तब विश्व के सबसे अधिक शक्तिशाली और समृद्ध देशों में गिना जाता था। पर मैंने जो वहाँ देखा
, उससे मुझे वहाँ की स्थिति बहुत ही अलग और निराशा जनक नजर आई।
मास्को एयरपोर्ट के रेस्तरां में मैं और मेरी पत्नी पुष्पा 

            असली बात शुरू करने से पहले मैं यहाँ ये भी बता दूँ कि मैं मास्को कैसे पहुंचा। इस बात का बहुतों को शायद अंदाज भी न हो कि रूस की आर्थिक स्थिती बिगड़ चुकी थी और उनकी करेंसी रूबल का वास्तविक मूल्य बहुत गिर चुका था पर वहाँ की सरकार इस बात को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करती थी। रूस की अपनी एयरलाइन ऐरोफ़्लोट है। इनके जहाज़ लगभग सारी दुनिया के लिए चलते हैं। अगर आपको ऐरोफ़्लोट का टिकट लेना होता, और अगर आप इसके लिए पैसे अमरीकन डॉलरों में देते, तो आपको 10,000 रुपए का टिकट 3000 रुपये तक में मिल जाता। यह मैं उस समय यानि 1988 की बात कर रहा हूँ। टिकट पर किराया पूरा लिखा होता। ऐरोफ़्लोट वालों से मोल भाव भी करना पड़ता था।
            मुझे स्वीडन जाना था।  मेरे पत्नी भी मेरे साथ थी। क्योंकि मैं स्वीडिश यूनिवर्सिटी के बुलावे पर जा रहा था
, इसलिए मेरा किराया उनको देना था पर मेरे पत्नी का किराया मुझे वहन करना था। इसलिए मैंने ऐरोफ़्लोट से जाने का निर्णय लिया। ऐरोफ़्लोट की सभी उड़ाने मास्को होकर जाती हैं। इसलिए हमें मास्को होकर जाना और वापिस आना था। हमने वापसी पर मास्को घूमने का निर्णय लिया और आते हुए वहाँ का स्टॉप ओवर ले लिया जिसके लिए हमें कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ा। हम इससे पहले भी कई बार सफर कर चुके थे, दो बार ऐरोफ़्लोट में भी ट्रैवल कर चुके थे, इसलिए हमें बचत के ऐसे तरीकों खूब की जानकारी थी। 

मास्को के प्रसिद्ध रेड स्क्वेयर में मैं 
पीछे जो यह लंबी लाइन दिख रही है, ये वे लोग हैं जो वहाँ ही स्थित लेनिन की
समाधि में रखे उनके मृत शरीर के दर्शन करना चाहते थे
अब शुरू करते हैं मास्को का हाल। जैसे ही हम जहाज़ से उतरे, कस्टम वालों ने हमें घेर लिया। हम अपने साथ एक VCR ला रहे थे। VCR भारत में उन दिनों एक नया शौक और स्टेटस सिंबल था। हम दोनों को VCR का कोई विशेष शौक नहीं था, पर सोलन में जब भी मित्र और परिचित हमारे यहाँ आते तो VCR के बारे में पूछते। जब हम उनको बताते कि हमारे पास VCR नहीं है तो वे हमारा मज़ाक उड़ाते कि आप कैसे आदमी हो, इतना बाहर आते जाते रहते हो और घर में VCR तक नहीं है। सो इस बार हमने खरीद ही लिया क्योंकि हमें लगा कि भारत में इसके बिना गति नहीं है। कस्टम वालों ने कहा कि इसे आप अपने साथ बाहर नहीं ले जा सकते। अगर ले जाएँगे तो आपको इसकी कस्टम ड्यूटी देनी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि हम यह VCR उनके गोदाम में जमा करा दें और वापसी पर रसीद दिखा कर ले लें। हमें  उन कर्मचारियों का व्यवहार बहुत अजीब सा लग रहा था। वे दबी ज़ुबान में डॉलर डॉलर भी बोल रहे थे। उस समय मास्को अङ्ग्रेज़ी बहुत कम समझी जाती थी, इसलिए बात करने में भी मुश्किल हो रही थी। खैर हमने VCR वहाँ जमा करा दिया और रसीद ले ली जो रूसी भाषा में थी और हमारी समझ से बाहर थी। हमें ये सारे लोग बहुत लालची लग रहे थे।
रेड स्क्वेयर पर मैं और पुष्पा
वहाँ हवाई अड्डे पर और भी लोग हमारे आगे डॉलर डॉलर गुनगुना रहे थे। यह बात कुछ देर बाद हमारी समझ में आई। दर असल वहाँ डॉलर का ब्लैक हो रहा था और ये लोग हमसे पूछ रहे थे कि क्या हमें अपने डॉलर देने हैं? उस समय की स्थिति यह थी कि रूसी सरकार ने एक रूबल का सरकारी मूल्य 1.5 डॉलर रखा था। जबकि वास्तविक स्थिति कुछ और ही थी। मार्केट में अगर आपको एक डॉलर लेना होता तो 11-12 रूबल देने पड़ते। ये लोग विदेशी आगंतुकों से 5-6 रूबल प्रति डॉलर, या इस से भी अधिक देकर डॉलर खरीद लेते और फिर आगे अधिक दाम पर बेच देते। हम जब तक वहाँ रहे, लोगों को डॉलर के लिए पूछते ही देखा।
            मुझे स्वीडन से चलते समय हमारे डाइरेक्टर ने इस बारे में सावधान कर दिया था और कहा था कि हम किसी से भी इस प्रकार का सौदा न करें क्योंकि बहुत बार इन डॉलर खरीदने वालों में पुलिस के आदमी भी होते हैं जो आपको बाद बहुत तंग करेंगे और भारी रिश्वत की मांग करेंगे। इसलिए यह लालच छोड़ कर हमने अपने डॉलर सरकारी रेट यानि डेढ़ डॉलर प्रति रूबल के हिसाब से ही बदलवाए। हमारे साथ एक बंगला देशी विद्यार्थी भी सफर कर रहा था। वह अपने डॉलर 11 रूबल प्रति डॉलर के हिसाब से बेच आया। इस कारण हमने मास्को में बहुत कम खर्च किया।  बस दो तीन सबसे सस्ते से  स्मृति चिन्ह लेकर मन मार लिया।
            जैसे ही हम अपने होटल में पहुंचे वहाँ डॉलर मांगने वालों के अतिरिक्त कुछ रूसी महिलाएं भी आ गईं और मेरी पत्नी को पूछने लगीं कि उसके पास कोई लिपस्टिक या अन्य कौस्मेटिक तो बिकाऊ नहीं हैं
? ऐसा लगा वहाँ इन चीजों का अभाव था। वैसे हमारे देश में भी एक समय ऐसा ही था। लोग इंपोर्टिड चीजों के दीवाने हुआ करते थे। 
            उन दिनों जनवरी का महीना था और मास्को में बहुत ठंड थी। वे लोग स्नो कटर मशीनों से बर्फ हटा कर एक तरफ कर देते हैं। ये बर्फ के टुकड़े ऐसे लगते थे जैसे बड़ी बड़ी सफ़ेद पत्थर की चट्टानें
, जैसी कांगड़े की खड्डों में होती हैं, हों। बाहर बाज़ार में खाने पीने की चीज़ें काफी सस्ती थीं। हाँ जिस होटल में हम रुके थे, वहाँ सब कुछ बहुत महंगा था।
मास्को की मेट्रो में हम दोनों 
            मास्को में जिस चीज़ ने हमें सबसे अधिक प्रभावित किया
, वह थी वहाँ की मेट्रो। हालांकि यह सेवा काफी पुरानी है पर फिर भी बहुत अच्छी है। स्टेशन और प्लेटफॉर्म आदि ऐसे ऐसे लगते हैं जैसे कोई पुरानी ऐतिहासिक इमारत हो। किराया केवल 10 कोपेक। इस किराये में पूरे मास्को शहर आप जहां मर्जी चले जाएँ। हाँ मेट्रो में एक बहुत बड़ी परेशानी थी। सारे साइनबोर्ड रूसी भाषा में थे। विदेशियों को आप अपनी मंज़िल पर पहुँच गए हैं या नहीं, यह पता लागाना असंभव था। क्योंकि साथ वाले मुसाफिर आपकी भाषा नहीं समझते थे। इस मुश्किल का हमने एक हल निकाल लिया। हम चलने से पहले जिस स्टेसन पर हमें उतरना होता था, उसका नाम रूसी भाषा में एक कागज पर लिखवा लेते। फिर वह चिट हाथ में पकड़े रहते और साथ बैठे मुसाफिरों को दिखाते रहते। वह हमारा तात्पर्य समझ जाते और जब भी हमारा स्टेशन आता हमको बता देते। हमने यह मैसूस किया कि रूसी लोगों का रवैया हम भारतीयों के प्रति बहुत मित्रवत और उदार था।
            अब सुनिए वापसी में हमारे साथ क्या बीती। हम एयर पोर्ट पर ठीक समय पर पहुँच गए थे। चैक इन करने के बाद मैं अपना
VCR लेने कस्टम वालों के पास गया। पर वो तो जैसे अजनबी बन गए और मुझसे बहुत रूखेपन से पेश आने लगे। वे सभी रूसी भाषा में बात करते। एक कमरे से दूसरे में भेज देते। हाँ दबी ज़ुबान में डॉलर जरूर बोल देते। मेरी समझ में आ गया कि ये लोग मुझसे रिश्वत चाह रहे हैं। फ्लाइट का डिपारचर अनाउंस हो चुका था और जहाज़ में बैठने के लिए मुसाफिरों ने लाइन लगानी शुरू कर दी थी। एक बार तो मैंने तय कर लिया कि 5-7 डॉलर इन के मत्थे मार कर पीछा छुड़वा लूँ पर एक आखिरी कोशिश की और मैंने ऐसा जाहिर किया कि मैं उनकी बात नहीं समझ पा रहा हों। थोड़ा गुस्सा भी दिखाया और इशारों से यह भी बताने की कोशिश की कि मैं उनके सीनियर अफसर के पास जाता हूँ। तीर निशाने पर बैठ गया और वे मेरा VCR ले आए।
            मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि 1989 में रूस की आर्थिकी बिगड़ चुकी थी। हाथी के खाने के दाँत और
, तथा दिखाने के और थे। अपने जिस रूबल का मूल्य उन्होंने डेढ़ डालर रख रखा था, उसका वास्तविक मूल्य 8 सेंट था। आज की तारीख में एक डॉलर के 70 रूबल मिलते हैं, यानि एक रूबल का मूल्य डेढ़ सेंट सेंट हो चुका है।
            सुनते थे कि वहाँ सरकारी कर्मचारियों में बेईमानी और रिश्वतखोरी बहुत बढ़ गई थी जो हमने भी देख लिया था। वहाँ एक बात और बहुत अच्छी थी
, अपराध लगभग नहीं के बराबर था। 

May 27, 2020

OUR PARIS DREAM, WHICH CAME TRUE AFTER 35 YEARS


In 1964 Raj Kapur had produced his blockbuster romantic movie Sangam. It was a big hit and is considered a classic in India even today. Parts of this movie were shot in Europe. It also had very good cinematography. To my memory, it was the first Hindi movie shot those locations in Europe.  It had a short scene of a few minutes showing Raj Kapur and Vaijayanti Mala as a newlywed couple standing at second floor of the Eiffel Tower. This scene had become very popular during those days. Eiffel Tower became USP of the movie. All posters of this movie had a big picture of Eiffel Tower in the centre. Those were the days, when foreign travel was a very distant dream for us Indians and Eiffel Tower at Paris was nearly an impossible dream destination for most Indians.

The scene from movie Sangam showing Raj Kapur and Vaijayanti Mala
at Eiffel Tower which made us dream about visiting this place.

At that time I was posted at Dhaulakuan, near Nahan in HP. We were also recently married when we saw this movie at a theatre in Ambala Cantt in the year 1964. As the movie progressed, the silver screen came alive wherein Raj Kapur and Vaijyanti Mala were spending some blissful moments at Eiffel Tower on their honey moon. This scene really fascinated us and planted the dream of being at this place sometime in our lives. Though it seemed very far fetched during that point of time, almost like the dream of legendary “Sheikh Chilli”.

Dream fulfilled after 35 years, myself and my wife Pushpa at the Eiffel Tower.

But as the years passed and life continued, things changed and with it our fortunes too. As they say, you have to dream before your dream comes true. So one fine day after thirty five years, finally the much awaited dream became a reality and both I and my wife Pushpa were at Paris in May, 1999. We took a stroll around the lawns and watched this majestic structure from below. After that we took the lift to go up and reach the point where those particular scenes in movie Sangam were filmed. VOILA!! Our dream of standing at the same point, where Raj Kapur and Vaijayanti Mala had stood and watched the sprawling view of The City of Paris with river Seine flowing through. Our special moments on the Eiffel Tower were captured in my video camera by a fellow traveller.  This was a moment of great excitement and joy for both of us. We were also full of gratitude and thanked the Lord for making our 35 year old dream come true.  

A poster of the movie Sangam

I am posting here a picture of that dream moment. In fact it is not a camera photograph but a screen shot taken from the video made with my Sony Handycam. Therefore it is not so good but still serves the purpose of reliving us that great moment.


Another photo of Raj Kapur and Vaijayanti Mala at Eiffel Tower

May 23, 2020

हिंदु देश में नहीं है दुनिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर


 मुख्य मंदिर  

दुनिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर हिंदुओं के देश  नें नहीं है बल्कि कम्बोडिया में है जो कि एक बौद्ध देश है।  यह केवल सबसे बड़ा मंदिर ही नहीं है, बल्कि विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक भी है. 

यह कम्बोडिया के अति प्राचीन शहर अंगकोर में स्थित है और अंगकोर वाट के नाम से जाना जाता है. वाट कम्बोडियाई भाषा में मंदिर को कहते हैं. वास्तव में यह एक विष्णु को समर्पित मंदिरों का एक बहुत बड़ा समूह है जो जो सैकड़ों वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है. अंगकोर पुराने समय में कम्बोडिया की राजधानी हुआ करता था और उस समय इसे यशोधरपुर कहा जाता था. अब यह शहर ना के बराबर है. अब यहाँ से छः किलोमीटर दूर सियेमरीप नामक शहर है और मंदिर देखने जाने के लिए सियेम रीप जाना पड़ता है. सियेम रीप छोटा, पर सभी सुविधा संपन्न शहर है. यहाँ सारी दुनिया से पर्यटक आते हैं. असल में पर्यटन ही इस शहर का मुख्य व्यवसाय है.

मैं और मंडी के मेरे मित्र रामेश्वर शर्मा 

एक बहुत अच्छी बात जो मैंने यहाँ देखी वो यह थी कि यहाँ दुनिया के अन्य टूरिस्ट शहरों वाली लूट खसोट नहीं है. लोग बहुत भले हैं और यह जगह भारत से भी सस्ती है.


                               इस मंदिर का निर्माण सूर्य वर्मा द्वितीय (1049 – 66) ने शुरू कराया था.

यह मंदिर वास्तु कला का एक आश्चर्य है. इसके चारों ओर एक गहरी खाई है जिसकी लंबाई ढाई मील और चौड़ाई 650 फुट है। खाई पर पश्चिम की ओर एक पत्थर का पुल है। मंदिर के पश्चिमी द्वार के समीप से पहली वीथि तक बना हुआ मार्ग 1560 फुट लंबा है और भूमितल से सात फुट ऊंचा है। पहली वीथि पूर्व से पश्चिम 800 फुट और उत्तर से दक्षिण 675 फुट लंबी है। मंदिर के मध्यवर्ती शिखर की ऊंचाई भूमितल से 210 फुट से भी अधिक है। अंकोरवाट की भव्यता तो उल्लेखनीय है हीइसके शिल्प की सूक्ष्म विदग्धतानक्शे की सममितियथार्थ अनुपात तथा सुंदर अलंकृत मूर्तिकारी भी उत्कृष्ट कला की दृष्टि से कम प्रशंसनीय नहीं है।


परिसर का एक और मंदिर
हालांकि बहुत से मंदिर अब खंडहरों में बदल गए हैं पर फिर ये भी बहुत ही शानदार हैं. एक मंदिर के जीर्णोद्धार का काम भारतीय पुरातत्त्व विभाग की सहायता से हो रहा था.

एक मंदिर में बना विशालकाय मानव सिर - ऐसे मानव सिर इन मंदिरों की विशेषता है.

यह सचमुच ही बहुत दर्शनीय स्थान है और मेरी राय में अगर हो सके तो इसे अवश्य देखना चाहिए.

अर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा लगाया साइन बोर्ड
इस मंदिर का जीर्णोद्धार भारत के सहयोग से 
 किया जा रहा था.

May 16, 2020

AGE IS NOT JUST A NUMBER – MY THOUGHTS AFTER TURNING 81 TODAY


It is often said that “age is just a number” and therefore one should not bother when this number increases.
It is not a correct statement. Age is not a just a number but a reality. It does weaken your body and brings down its capacities as this number goes up. You cannot remain in youthful state by just keep on imagining that you are the person and have not changed.
As a B.Sc.Ag. student in 1957 at hostel at Ludhiana
This hostel has now been made a girls hostel. It was the first hostel which had
come up at PAU  and we were the first group of students to move into it.

I turned 81 today. Therefore I am trying to revaluate myself. The past one year has brought a big change in my physical capabilities. My gait has changed many times I am not able to balance myself, especially when I am out of my home compound. Therefore I need to use a walking stick. I have to take an auto for going to market or to friends’ places. This is resulting in reduction in my contact with outside world. Most of my socialization now is through Face Book  only. I do miss sitting and having a drink with friends. I also miss my favourite jalebi, gulab jamuns and non-vegetarian food items which my doctors have asked me stop completely. Another unwelcome change is that feeling of discomfort during sleep at night after I take a drink. Though this does not happen every time, but does happen in fifty per cent cases. I just cannot stand a second drink.
Needing walking stick now.

The positive side of the reduced outdoor activity, however, is that now I have more time for devoting to my favourite pursuit, writing. So during most of my time now, I am in my study.
I am also developing a feeling now that is has been enough and therefore will not be bad to retire from this world. As with more age related body problems, life in coming years may not be easy. I am also reminded about Mitch Aboms international best seller, “Tuesdays with Morie”, which has an account of the last days of a helpless professor.
My suggestion for reading 

I have also recorded my feelings in this blog when I had turned 75 (https://fruitipedia.blogspot.com/2018/09/thoughts-in-my-mind-on-75th-birthday-16.html) and then last year after turning 80  (https://fruitipedia.blogspot.com/2019/05/thoughts-in-my-mind-on-turning-eighty.html). Friends, please read these too and then tell me whether I am right or not.
I shall be eagerly looking forward for your comments.

May 6, 2020

लॉकडाउन में बाल कटवाए तो याद आ गया स्वीडन


बाल बनवाए तीन महीने हो चले थे। इन बढ़े बालों ने सूरत तो बिगाड़ ही दी थी पर अब असुविधा भी मैसूस होने लग गई थी। ऐसे में सोचा क्यों न पड़ोस में रहने वाले नाई, जिसकी दुकान और बिजनेस लौकडाउन  के कारण बंद था, को पूछा जाय कि क्या वह सहायता कर सकेगा और घर में आकर बाल काट जाएगा? वह तुरंत मान गया, पर साथ धीरे  से यह भी बोला कि सौ रुपए होंगे (यहाँ मेरे शहर में बाल काटने का आम रेट चालीस रुपये  है)। मैंने हाँ करदी और उसको बुला लिया। मैं घर के बाहर कुर्सी पर बैठ गया। सावधानी के तौर पर मैंने उसे केवल अपनी कैंची ही लाने को कहा जो मैंने उपयोग से पहले सैनिटाइज़ कर ली। बाकी तौलिया आदि मैंने अपना ही दिया। लगता है कि इस मंदी के वक्त में उसको भी काम की जरूरत थी। उसने बड़ी तबीयत से मेरे बाल काटे। भारत में बाल कटवाने के मैंने अपने जीवन में ये सबसे ज्यादा पैसे दिये थे। मेरी उम्र 81 वर्ष है और मैंने दो आने से बाल कटवाने शूरु किए थे।
            इस बात ने मुझे और मेरी पत्नी को 32 साल पहले के हमारे स्वीडन प्रवास के दिन याद दिला दिये। तब हम साउथ स्वीडन शहर कृहनस्टाड की एक देहाती उपबस्ती बाल्सगार्ड में रहते थे जो कृहनस्टाड 11 किलोमीटर थी। बाल्सगार्ड में कोई भी बाज़ार आदि नहीं था और सभी सुविधाओं के लिए हमें कृहनस्टाड जाना पड़ता था। हम यूनिवर्सिटी के गैस्ट हाउस में रहते थे। हमारे साथ के सैट में एक चीनी विद्यार्थी युवक रह रहा था। वह हमसे चार महीने पहले वहाँ आया था और कुछ दिनों में वापिस जाने वाला था।  

 क्रिहनस्टाड के बस स्टैंड पर मेरी पत्नी पुष्पा
            यह हमारी पहली विदेश यात्रा नहीं थी। मुझे इस बात का एहसास था का विदेशों में बाल कटवाना काफी महंगा होता है। इसलिए मैंने चलने से पहले सोलन में, जहां मैं उस समय कार्यरत था, बाल कटवा लिए थे।
            जब स्वीडन में बाल कटवाने लायक हो गए, तो मैंने अपने स्वीडिश साथियों से पूछा कि मैं बाल कहाँ कटवाऊँ। पर जब मैंने रेट सुना तो मेरे होश तो उड  गए। वहाँ पुरुषों की बालकटाई का रेट कम से कम चार सौ रुपये था। उस समय सोलन में इस काम में पाँच रुपये से अधिक नहीं लगा करते थे। पर स्वीडन में तो यह रेट दो हज़ार रुपये तक था।


            स्वीडन में एक नाई की दुकान 
              हमारा पड़ोसी चीनी युवक वांग हमारी हैरानी ताड़ गया था। उसने हंस कर मेरी पत्नी को सलाह दी कि इतना पैसा बर्बाद करने के बजाय वो मेरे बाल खुद ही काट लिया करे। उसने फिर कहा कि उसे बाल कटाई के महंगे रेटों बारे में चीन से चलने के पहले चीन में उसके अनुभवी चीनी मित्रों ने सावधान कर दिया था और इसलिए वो वहाँ से बाल काटने की मशीन और कैंची लेकर आया है और हम इनका  उपयोग करके ये खर्च बचा सकते हैं। हमें भी उसकी बात में बुद्धिमानी नज़र आई और फिर जब तक हम वहाँ रहे, मेरी पत्नी ही मेरे बाल काटती रही। चीनी युवक शीघ्र ही वापिस चला गया। जाते हुए ये दोनो चीज़ें वह हमें भेंट कर गया। वहाँ से वापिस आते हुए हम इन्हें अपने साथ भारत भी ले आए। कैंची तो साधारण थी पर वह मशीन बहुत ही उत्तम क्वालिटी की थी और बाल बहुत अच्छी तरह, बिना बाल उखाड़े, काटती थी। बाद में मैंने ये दोनों चीज़ें यहाँ अपने नाई को दे दी थी।
बाल्सगार्ड में मेरे एक सहयोगी के परिवार संग पुष्पा 
            यहाँ मैं पाठकों को एक बात समझाना चाहता हूँ कि उन दिनों जब भी किसी भारतीय को विदेश में काम करने का अवसर मिलता था, तो उसका मुख्य ध्येय वहाँ अधिक से अधिक बचत करके पैसा या विदेशी सामान, जो भारत में उन दिनों दुर्लभ हुआ करता था, लाना हुआ था। इसलिए सभी ज्यादा से ज्यादा पैसा बचाने की कोशिश में रहा करते थे। सोलन में उस समय मेरी  तनख्वाह कोई 6-7 हज़ार के आस पास रही होगी। इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि बाल कटाने के 400 रुपये मुझे कितने अधिक लगे होंगे। आप यह भी अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उस चीनी युवक की दी हुई वह कैंची और मशीन तथा मेरी पत्नी पुष्पा की बाल काटने की स्किल(?) हमारे लिए कितनी उपयोगी सिद्ध हुई होगी।
            यहाँ यह बताना भी प्रासंगिक रहेगा कि स्वीडन में हैयर ड्रेस्सिंग की वहाँ की आईटीआई किस्म के संस्थानों में विशेष ट्रेनिंग हुआ करती थी। हमारे यहाँ की तरह कोई भी युवक/युवती किसी उस्ताद से बाल काटना सीख कर नाई का काम नहीं कर सकता था। कम से कम अवधि का कोर्स एक साल का था और इस कोर्स की बहुत मांग थी। हमें हमारी पड़ोसन ने बताया कि स्वीडन में एमबीबीएस जैसे कोर्स के लिए इतने आवेदक नहीं होते जितने कि हैयर ड्रेस्सर के कोर्स में दाखिला लेने के लिए होते हैं क्यों कि यह वहाँ यह बहुत ही कमाई वाला व्यवसाय था।  
   

April 25, 2020

SELF PUBLISHING - ADVICE FROM A PUBLISHED AUTHOR TO PROSPECTIVE AUTHORS

These days one sees a lot of advertorial posts by self publishing companies asking prospective authors to come to them with their manuscripts. I am noting that the number of such publishers is increasing. Till two years back, there were only 2-3 such companies but now you see a new name every 2-3 months. They lure authors by attractive publishing packages and big promises.
I got a book published from one of such publishers. It was released last year in May. Here is my experience about self publishing which I want to share with friends. It might help them.
What is self publishing?
First of all let me tell about this process of self publishing. You give your manuscript to the publisher. Choose a publishing package. Sign a contract. He takes 50 per cent of amount at the time of signing the contract and rest after a few weeks when the book is in the final stages of production. During these days, the publisher designs the cover, completes the formalities regarding ISBN number etc. and will tell you the estimated cost price of the book. He will also suggest you the ideal sale price of your book and royalty you will be getting from the sale of book. After these matters are finalized, you are asked to pay the publishing cost. The book will then go for printing. You are also asked the number of copies that you would like to buy for your use. The entire process is quite swift and the publisher keeps a continuous contact with you. Soon you will receive your copies plus 3 free copies from the publisher.

My book published by Blue Rose Publishers
Advantages:
It is not easy to find a publisher for a book. Publisher is a businessman and is into publishing to make money. Therefore he has his own criteria of choosing a book for publication. In fact, every book that he undertakes to publish is a business project for him and naturally he does not want to be a looser. He will try to select only those books which have a sale potential. Moreover every publisher is afraid of “first time” authors. So by spending a few thousand rupees you find a publisher for your book and become a “published author”.
Usually these publishers have a good team of workers specializing in different fields of book production. They also offer to get the manuscripts edited. So, on the whole the quality of book is good, though there are few options to save money too.
Disadvantages:
These publishers do nothing to promote sales. This you will have to do yourself. The publisher will just get the book listed for sale at online bookstores like Amazon and Flipkart. The record of the sale, however, is kept meticulously by the publisher on his website. When a copy is sold, you are informed by email.
Though the publishers say that they do not charge any money except the actual production cost, but it does not seem to be true. There are hidden charges. The cover price of my book, दुनिया जैसी मैंने देखी – 43 किस्से मेरी विदेश यात्राओं से, which has been published by Blue Rose Publishers in May, 2019, is 170 rupees. The production cost of the book is Rs.76.16. Amazon and Flipkart also add 40 rupees for forwarding and therefore a buyer gets a copy for 210 rupees. For each book, I am paid a royalty of 23 rupees. If the book is sold by the Blue Rose (publishers), then the royalty amount is 90 rupees, but I have noticed that books are sold only by Amazon. From the list of titles published by Blue Rose, it seems to be quite experienced publisher.
Now let us come to economics. The price of my publication package was 19,045 in which they gave me 3 copies. I had ordered 100 copies for my use for which I was asked to pay 7700 plus 1550 for shipping. This way the whole package cost me 28,295 rupees for 103 copies.
If you want more copies later, the charge is different. Though the production cost for this book is only Rs.76.16 per copy, but there are many additions to it. Rs.17.70 is their handling charge per copy and the forwarding for a lot of 50 copies is Rs. 920.40. Thus I paid rupees 5613.40 for 50 copies which I had bought later, meaning that each copy costs me 112.27. So I pay Rs. 36.11 extra for each copy which is 47 per cent of the cost price.
For each copy sold online by Amazon and Flipkart, I am paid a royalty of 23 rupees.
Till today, 50 copies have been sold online. I have been promoting the book myself a lot on social media. I also sent copies for review to some magazines and newspapers but only Divya Himachal published a review and others have been keeping quiet though I had sent them the copies only after getting their nod.
Conclusion and advice:
Self publishing is a losing bargain as these publishers do not do anything for promoting the sale. Their profit lies in book production and they hardly do anything after that. Self publishing will suit only those, who have links in governments and can manage to get copies purchased for various state libraries. Such people usually price their book quite or even very high and then make money. Or it will suit those who just “want to be recognized” as author and are ready to spend money for it.
I would advise all prospective authors, especially the first time ones, to try to get their work published from established publishers, even if they ask for some money too. These people have their sales net work and mange to sell a few thousand copies to state and other libraries so that your work is able to reach atleast some people. I have written two more books besides this and I say it on the basis of my personal experience.
At the end, I would also advise the authors to read the book, “BOOK Publishing – PRINCIPLES & PRACTICES” by one of the senior publisher Dina N. Malhotra, who had founded Hind Pocket Books and owns very big publishing companies of India. This book gives a very good idea about the kind of manuscripts sought by publishers.

 

Dina N. Malhotra's book which in my opinion every prospective 
author must read before looking for a publisher.