October 12, 2017

पेरिस – एक ऐसा शहर जहां परियां उड़ा करतीं थी.



आप शीर्षक पढ़ कर मत चौंकिएगा. यह मैं नहीं कह रहा हूँ. ऐसा बताया करते थे पेरिस के बारे में मेरे दादा के चचेरे भाई, जमादार गुसाऊँ राम, जब वे अपने विदेश प्रवास के किस्से सुनाते थे.

आज से सौ साल पहले हिमाचलियों का विदेश जाना ना के बराबर था. तब शायद किसी पहाडी रियासत का कोइ राजा बेशक इंग्लैण्ड या फ्रांस की सैर कर आता होगा पर उन दिनों साधारण व्यक्ति के लिए लाहोर की यात्रा करना भी बहुत बड़ी बात होती थी. अधिकतर लोगों का सफ़र हरिद्वार या कुछ दूसरे तीर्थ स्थानों तक ही सीमित हुआ करता था. 
 फिर पहला विश्व युद्ध आया और उसमें भाग लेने के लिए भारत से सिपाही भरती किये गए. इनमें मंडी, बिलासपुर कांगड़ा इलाकों से भी बहुत लोग गए. ये पहाड़ों से पहले लोग थे जिन्होंने यूरोप देखा. इस कारण इन लोगों का समाज में बहुत सम्मान था.

जमादार गुसाऊं, जिनको गाँव के सब लोग जमादार मियाँ और हम लोग जमादार दादा कहा करते थे, अपनी नौकरी के दौरान मिडल ईस्ट और यूरोप में फ्रांस तक हो आये थे. वो शायद अपने काम में बहुत अच्छे होंगे और इसलिए फ़ौज में जमादार (अब नायब सूबेदार) के पद तक पहुँच गए थे जो उस समय सेना में भारतीयों के लिए काफी बड़ा ओहदा हुआ करता था. उन्हें उनकी सेवा के पुरस्कार स्वरुप मुल्तान (पकिस्तान) में ज़मीन के मुरब्बे भी दिए गए थे.
जमादार गुसाऊँ राम

पहले गाँव में लोग चौकोर घरों में (जिनको चौकी कहा जाता था, रहा करते थे. एक चौकी में कई परिवार रहा करते थे. हमारे परिवार की भी गाँव में चौकी थी. उन दिनों मनोरंजन का कोइ साधन नहीं हुआ करता था. शाम को खाना खाने के बाद मर्द लोग चौकी की बाहर की साइड के बरामदे में इकठ्ठा हो कर बैठ जाया करते थे, हुक्का पीते थे, और गपशप किया करते थे. शराब पीने का उस वक्त वक्त प्रचलन नहीं था, फौजियों में भी. मैंने अपनी दादा की पीढी के किसी बुज़ुर्ग को शराब पीते ना देखा और ना सुना. सर्दी के दिनों में वहीं बरामदे में बनी एक बड़ी सी अंगीठी, जिसे मंड्याली में गीठा कहते थे, सेंकने के लिए आग जला ली जाती थी. आस पास के घरों के कुछ और भी लोग आ जाया करते थे. बुज़ुर्ग लोग अपने समय के किस्से सुनाया करते थे जिसे हम बच्चे बहुत ही कुतुहलपूर्वक सुना करते थे. हम मंडी में रहते थे पर जब स्कूल में छुट्टियां होती थी तब मैं और मेरी माता जी हमारे गाँव भद्रोही में संयुक्त परिवार में कुछ दिन बिताने चले जाते थे. उसी समय ऐसे किस्से सुनने को मिला करते थे.

जमादार दादा एक किस्सा कई बार सुनाया करते थे. वह बताते थे कि जब उनकी फ़ौज लड़ाई में जीत कर फ्रांस के पेरिस शहर में दाखिल हुई तो उनका बहुत ही शानदार स्वागत हुआ. फ्रांस की मेमें हम फौजियों से चिपक जाया करतीं थी. कई बार वे हम फौजियों को खुले में ही “किस” कर लिया करती थीं. यह बात सब लोगों को बहुत ही प्रभावित करती थी क्यों हिन्दुस्तानी के लिए, मेम का चिपक जाना और किस करना, वो भी आज से नब्बे साल पहले बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उस वक्त तो हम नहीं समझ पाते थे, पर मुझे अब पूरा विश्वास है कि जमादार दादा और उन जैसे बाकी फ़ौजी भी, बातों को खूब बढ़ा चढ़ा कर बताया करते होंगे. 
  
फिर वो पेरिस शहर के बारे में बताया करते थे. क्या खूबसूरत शहर है पेरिस. सड़कें ऐसी साफ़ कि जैसे शीशे के बनी हों. फिर वो जब पेरिस की याद में ज्यादा इमोशनल हो जाते थे, तब कहते थे पेरिस में उस वक्त परियां उड़ा करती थीं. फिर बाद में धीरे से यह भी कह देते, “मुझे पता लगा है कि उन परियों में से दो चार तो अब भी हैं”. सुनने वाले सोचते कि जमादार मियाँ कितने भाग्यशाली हैं जो परियां भी देख चुके हैं.

मुझे सन 1984 में पेरिस जाने का मौक़ा मिला. यह मेरा यूरोप आने का पहला अवसर था. मैं इंग्लैण्ड आया था. मेरा नाम यूं एन वोलंटीयर की पोस्ट के लिए भेजा गया था. मुझे उस सिलसिले में जनेवा के संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में लोगों से मिलना था. मैं इंग्लैण्ड से रेल द्वारा जनेवा गया. वापसी पर तीन दिन के लिए पेरिस घूमने लिए रुक गया. पेरिस पहुंचाते ही मुझे जमादार दादा की सुनाई परियों वाली बात याद आ गयी.

1984 में मैं अपनी उस पेरिस यात्रा के दौरान मैं पेरिस के प्रसिद्ध लूव म्यूजियम के उस 
कक्ष में जहां विभिन्न मूर्तिकारों द्वारा बनाई यूनानी देवी वीनस की ही मूर्तियाँ रखी गयी हैं.

मैं पेरिस में लगभग सभी जगह घूमा और सभी मुख्य स्थान देखे. असल में मैं न्यूयॉर्क से लन्दन होता हुआ भारत आ रहा था. न्यूयॉर्क में भी मैं एक सप्ताह रुका था और उस शहर को जी भर के देखा था. इंग्लैण्ड में मेरा एक पुराना दोस्त रहता है, मैं उसी के पास रुका था.

उन दिनों आज की तरह टेलीफोन नहीं थे. इसलिए चिट्ठियों से ही काम चलाते थे. मेरे माता पिता मंडी में रहा करते थे और पत्नी और बच्चे सोलन में. जब भी किसी प्रसिद्द स्थान पर पहुंचता तो वहां का पिक्चर पोस्ट कार्ड खरीद कर घर भेज दिया करता.

पेरिस में भी मैंने पिक्चर पोस्ट कार्ड खरीदे और एक कार्ड ख़ास तौर पर मैंने अपनी माता जी को लिखा. वो पढी लिखी नहीं थी और लन्दन, पेरिस या जनेवा कहाँ हैं यह नहीं जानती थीं. उनको यह समझाने के लिए कि मैं अब कहाँ हूँ, मैंने लिखा था, “अम्मां जी आज मैं उस शहर में हूँ जिसके बारे में जमादार दादा बताया करते थे कि वहां परियां उडती हैं. पर मुझे तो अभी तक कोइ परी नहीं दिखी.”.    

 मेरी स्वर्गीय माता शांता देवी

September 26, 2017

जिस दिन मंडी में राजा के राज का अंत हुआ




जैसा कि आप सबको पता ही होगा आज के हिमाचल प्रदेश का गठन सन 1948 में किया गया था. उससे पहले यहाँ छोटी बड़ी पच्चीस या छब्बीस रियासतें थी जिनपर राजाओं का शासन था. इन सब रियासतों का स्वतंत्र भारत में विलय करके नए राज्य हिमाचल प्रदेश का गठन किया गया था.

       बाकी स्थानों पर ऐसा कैसे हुआ था यह तो मुझे मालूम नहीं है. पर मंडी रियासत के विलय की मुझे अच्छी तरह याद है हालांकि मेरी उम्र तब नौ साल की भी नहीं थी. उस वक्त मंडी में राजा जोगिन्द्र सेन का शासन था.

तत्कालीन मंडी रियासत का राज्यचिंह

       मेरे पिता मियाँ नेतर सिंह राजा के निजी स्टाफ में काम करते थे. वे राजा के निजी सहायक किस्म के कर्मचारी थे. हमेशा राजा के साथ रहते, डिक्टेशन भी लेते थे, सफ़र में राजा के निजी खर्च का लेन देन भी किया करते थे. निजी स्टाफ के लोग पैलेस में बने स्टाफ क्वार्टरों में रहा करते थे.

       मेरे दादा जमादार गौरी शंकर ने भी राजा के निजी स्टाफ में ही नौकरी की थी. असल में ये राजा काफी चतुर किस्म के शासक हुआ करते थे. उन्होंने अपनी रियासत में कुछ वफादार स्वामीभक्त परिवार चिन्हित किये होते थे. राजमहल से सम्बंधित कामों के लिए इन्हीं परिवारों से लोग रखे जाते थे. शायद इसलिए ताकि राजा और उसके परिवारजनों को कोइ ख़तरा ना हो और न ही राजमहल में होने वाली बातें बाहर जनता तक पहुँच सके. मेरे दादा जो बातें सुनाया करते थे, उससे अंदाज लगता था ये कर्मचारी अपने राजा के लिए बहुत ही समर्पित और वफादार हुआ करते थे. 

मंडी रियासत के अंतिम शासक राजा जोगिन्द्र सेन 
  
       मुझे तारीख तो याद नहीं है पर यह अच्छी तरह याद है कि उस दिन स्टाफ क्वार्टररों का माहौल काफी तनावपूर्ण था. सब लोग गुमसुम थे और आपस में धीमी आवाज़ में बात कर रहे थे कि आज मंडी में राजा का राज ख़त्म हो जाएगा. जो सीधे सादे पुराने लोग थे, वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि अब क्या होगा. उनका सोचना था कि राजा के राज के समाप्त होने का मतलब था अराजकता. एब बुज़ुर्ग मेरे दादा जी से मंड्याली में कह रहा था, “मियां जी, भला ग्वालुँआ बगैर भी कदी डांगरे चरे” (मियाँ जी कभी बिना ग्वाले के भी पशु चराए जा सकते हैं). राजा के राज के अतिरिक्त कोइ दूसरी शासन व्यवस्था भी हो सकती है, ये उन लोगों की कल्पना के बाहर था.


मेरे दादा मियां गौरी शंकर जिनको विश्वास ही नहीं हो रहा था
कि मंडी में राजा का राज कभी समाप्त हो सकता है.

       मेरे दादा जी की एक चिंता और भी थी. वे कह रहे थे कि आज जरूर कुछ अनहोनी होगी. वे बता रहे थे कि मंडी के राजाओं को दसवें सिख गुरु का वरदान है कि मंडी में राजाओं का शासन हर हाल में चलता रहेगा और यदि कोइ मंडी को लूटेगा, तो उस पर आसमान से गोले बरसेंगे. मेरे दादा जी की नजर में राजा को हटा कर मंडी का शासन अंग्रेज चीफ कमिशनर को सौंप देना मंडी को लूटना नहीं तो और क्या था. यहाँ मैं यह भी यह बता दूं कि जब हिमाचल का गठन हुआ, तो प्रशासनाध्यक्ष चीफ कमिशनर को बनाया गया था और हिमाचल का पहला चीफ कमिश्नर एक अन्ग्रेज अधिकारी, ई. पी. मून, नियुक्त हुआ था.

       मंडी रियासत के भारत में विलय का एक सांकेतिक सा समारोह भी हुआ था. पर यह पब्लिक समारोह नहीं था. वहां कौन कौन लोग उपस्थित थे इसका ना तो मुझे पता ही था और ना ही इन बातों की समझ थी. समारोह  पैलेस के एक कोने में, जहां मंडी रियासत का झंडा लगा होता था, हो रहा था. जब राजा के राज की समाप्ति घोषित की गयी तब पैलेस में लगे ध्वज स्तम्भ पर मंडी रियासत का झंडा नीछे किया गया और और भारत का राष्ट्रीय तिरंगा झंडा ऊपर कर दिया गया. उस समय मंडी रियासत की सेना के बैंड ने धुनें भी बजाई थी.

       स्टाफ क्वार्टरों के एक कोने से पैलेस का झंडा दिख जाता था. स्टाफ क्वार्टरों में रह रहे कुछ मर्द और औरतों ने जिनमें हम बच्चे भी शामिल थे, डरते हुए छुप कर झाड़ियों की ओट से झंडों की यह अदला बदली देखी. सब कुछ क्षणों में शांतिपूर्वक हो गया. कोइ अनहोनी नहीं हुई. 

       मेरे दादा जी, जिनकी उम्र उस समय 65 वर्ष की रही होगी, बहुत हैरान थे. उन्हें पक्का विश्वास था कि उनके राजा की गद्दी कोइ नहीं छीन सकता. पर ऐसा हो गया और मंडी रियासत में पांच सौ वर्षों से चला आ रहे राजाओं का राज वगैर किसी विघ्न के समाप्त हो गया.

August 23, 2017

जापान के हरडपोपो



पता नहीं मंडयाली बोली के इस शब्द “हरडपोपो” से आज कितने लोग परिचित रह गए होंगे. क्योंकि समाज का यह वर्ग अब तकरीबन लुप्त ही हो गया है. पर पुराने लोगों को इनकी अवश्य याद होगी. ये लोग घर घर घूम कर लोगों को उनका भविष्य बताया करते थे. कई बार हाथ देख कर और कई बार फेस रीडिंग या ऐसे ही कुछ अन्य तरीके अपना कर. इन लोगों की एक विशेष प्रकार की वेशभूषा हुआ करती थी. अपने काम के किये ये अधिकतर अनाज आदि लिया करते थे
.
       चिर काल से लोगों में अपने भविष्य के प्रति जिज्ञासा रही है. सब जानना चाहते हैं कि भविष्य में उनके साथ क्या होने वाला है. मैं दुनिया में जहां भी गया, मैंने ये हरड पोपो या भविष्य वक्ता किस्म के प्राणी अवश्य देखे. 

आइये आज आपको जापान के हरडपोपुओं के बारे में बताते हैं.

 
क्योतो की गेबोन स्ट्रीट

मूझे जापान में कुछ सप्ताह बिताने का अवसर मिला था. मैं क्योतो शहर की प्रसिद्ध व्यापारिक सड़क, गेबोन स्ट्रीट के मैं एक होटल में रुका था. वहां मैं लगभग एक सप्ताह रहा. शाम के समय सड़क के किनारे रोज़ वहां एक जापानी भविष्य वक्ता महिला बैठी होती थी. वह हमेशा पारंपरिक जापानी वेशभूषा, किमोनो पहने रहती. आपको मैं यहाँ बता दूं कि हालांकि किमोनो जापान की पारंपरिक और राष्ट्रीय वेशभूषा है, पर इसे महिलायें अब केवल विशेष अवसरों पर ही पहनती हैं और रोजाना उपयोग के लिए पश्चिमी ड्रेस जैसे स्कर्ट या जीन्स आदि  ही का प्रयोग करती हैं. मुझे ये बताया गया कि किमोनो सिलवाने में खर्च भी बहुत आता है और फिर इसकी संभाल भी करनी पड़ती है. महिलाएं किमोनो के साथ वह बहुत ही गहरा मेकअप भी करती हैं. उनका चेहरा इतना अधिक पुता होता है कि चमड़ी नज़र नहीं आती. 
क्योतो की वह जापानी हरड पोपो महिला

यह जापानी महिला सड़क के किनारे एक स्टूल रख कर बैठी होती. उसके आगे एक मेज़ हुआ करता था जिस पर एक मेजपोश बिछा होता था. मेजपोश पर जापानी भाषा में कुछ पंक्तियाँ लिखीं होती थीं जो शायद उसका साइन बोर्ड होती थी. मेज़ के ऊपर एक मोमबती जली होती थी और उस मोमबती को एक विशेष लैम्प शेड जिस पर भी जापानी भाषा में कुछ लिखा रहता था, रखा होता था. यह महिला इस तरह बैठ कर अपने ग्राहकों का इंतज़ार करती रहती थी.

मैं क्योतो विश्वविद्यालय के एम् एस सी हौरटीकल्चर के छात्र छात्राओं के बीच   

मैं क्योतो में पांच या छः दिन रुका और हर शाम उस महिला को वहीं बैठे देखा करता था. मैंने एकाध बार उससे बात करने की कोशिश की पर उसको सिवाय जापानी के कोइ दूसरी भाषा नहीं आती थी. एक दिन मैंने उसकी एक फोटो भी खेंची. हाँ वह जब भी मैं उधर से गुजरता, तो वह मुस्करा कर मेरे अभिवादन का उत्तर अवश्य दे दिया करती थी. पता नहीं यह संयोग था या सच्चाई, पर मैंने उस महिला के पास कभी कोइ ग्राहक नहीं देखा. इसलिए कह नहीं सकता कि वह इस काम से कितना कमा लेती थी.

क्योतो के बाद मेरा अगला पड़ाव टोकियो था. वहां मैं एक सप्ताह रहा. टोकियो में मैंने दूसरी किस्म के हरड पोपो देखे. ये मर्द थे और मशीन से हाथ देखते थे. इनके पास एक डिब्बा किस्म का उपकरण होता था जो एक रेहडीनुमा ठेले पर रखा होता था. इस उपकरण के ऊपर एक शीशा लगा होता था जिसके ऊपर ग्राहक को अपनी हथेली रखनी होती थी. हरड पोपो एक स्विच दबाता, उपकरण में कुछ आवाजें होतीं और फिर नीचे से दो कागज़ बाहर आ जाते जैसे कि कंप्यूटर के प्रिंटर से आते हैं. इनमे से एक कागज़ पर आपकी हथेली की लकीरों की फोटोकॉपी होती और दूसरे कागज़ पर आपका भविष्य. हरड पोपो कहता कि उसके उपकरण में कम्प्युटर लगा है जो आपके हाथ की रेखाओं को पढता है और भविष्य बताता है. उस समय इस काम के वह 200 जापानी येन यानि लगभग 120 भारतीय रुपये लेता. 

क्योंकि इनका भी सारा काम जापानी भाषा में हो रहा था, इस लिए मेरी समझ से बाहर था. वरना शायद तमाशा देखने के लिए ही शायद मैंने भी 200 येन खर्च कर दिए होते.

       अगली बार आपको अर्जेंटीना के हरड पोपुओं के बारे में बताउंगा.       

August 20, 2017

बग़दाद यूनिवर्सिटी में मिला करते थे सचमुच के "पे पैकेट"



सन 1980-81 में मुझे भारत सरकार के फौरेन अस्साइनमेंट सैक्शन के द्वारा बगदाद विश्वविद्यालय के कृषि कॉलेज मे नौकरी करने का अवसर मिला था. मैं वहां हौरटीकल्चर का असिस्टैन्ट प्रोफ़ेसर नियुक्त हुआ था. 

उस समय इराक़ अपनी आर्थिक समृधि की उच्चतम सीमा पर था. तब एक इराकी दीनार के 3.3 अमरीकी डॉलर मिल जाया करते थे जबकि आज एक अमरीकी डॉलर लेने के लिए इराकियों को 1185 दीनार देने पड़ते हैं. इस से ही आप यह अंदाज लगा सकते हैं कि इराक़ पिछले 35-36 कहाँ से कहाँ पहुँच गया है. जब मैं वहा पहुंचा, तब ईरान-ईराक युद्ध को शुरू हुए दो महीने हो चुके थे पर तब तक इस युद्ध का लोगों के दैनिक जीवन पर कोइ असर नहीं पडा था. दैनिक उपयोग की सब चीजें ना केवल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध ही थीं पर बहुत सस्ती भी थी. ये वो दिन थे जब भारत में एक अच्छा रेडिओ कैसेट प्लेयर भी एक साधारण भारतीय यूनिवर्सिटी अध्यापक कया ड्रीम पोजेशन हुआ करता था. वी सी आर तब शुरू ही नहीं हुए थे. इसलिए उन दिनों जिसको इराक में नौकरी मिल जाती थी, उसे भाग्यशाली समझा जाता था.
उस समय के बग़दाद शहर का एक दृश्य

        ईराक़ी सरकार विदेशी प्रोफेसरों को बहुत अच्छा वेतन देती थी. एक पी एच डी प्रोफ़ेसर का मूल वेतन 400 दीनार था और इसमें पांच दीनार प्रतिवर्ष उसके शैक्षणिक अनुभव के जोड़े जाते थे. इस हिसाब से मेरा मासिक वेतन 435 दीनार तय हुआ था जो 1435 अमरीकी डॉलर यानि उस समय के हिसाब से लगभग 11,000 भारतीय रुपयों के बराबर था. तब सोलन के कृषि कॉलेज में जहां मैं पढाता था, में मेरी तनख्वाह 1100 रुपये भी नहीं थी. इसलिए मेरे लिए यह छप्पर फाड़ रकम थी. फिर इराक़ में कोइ इनकम टैक्स आदि भी नहीं था. उस पर एक बड़ी सुविधा यह भी थी कि विदेशी कर्मचारी अपने वेतन का 75 प्रति भाग मनचाही मुद्रा में वापस अपने देश ले जा सकते थे. ईराक में उस समय जीवन यापन बहुत ही सस्ता था और अच्छी तरह  रहकर भी आप आसानी से अपनी आधी तनख्वाह बचा लेते थे. अनेक लोग तो पूरा 75 प्रतिशत भी बचा लिया करते थे. मेरे पहुँचने के कुछ सप्ताह बाद मेरी पत्नी और दोनों बेटियां भी मेरे साथ रहने बग़दाद आ गयीं थी.

        वहां वेतन महीने की पहली तारीख को नहीं बल्कि पिछले महीने की 16 तारीख को दिया जाता था. यानि जनवरी का वेतन 16 दिसंबर को मिल जाता था. उनका वेतन देने कया तरीका भी बहुत ही अलग था. असल में वेतन भुगतान का ऐसा तरीका मैंने केवल इराक में ही देखा है हालांकि मैंने भारत से बाहर कुछ और देशों में भी काम किया है. 

बग़दाद यूनिवर्सिटी का कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर,
                                                               जहां मैं काम किया  करता था.
इराक़ में वेतन के “पे पैकेट” दिए जाते थे. इस से पहले मैंने पहले "पे पैकेट" शब्द केवल सुना या पढ़ा ही था. मेरा विचार था कि “पे पैकेट” सिर्फ एक व्यावसायिक शब्द या मुहावरा ही है। सचमुच के पे पैकेट भी हो सकते हैं, यह मैंने बग़दाद में ही देखा.

       शिक्षकों को वेतन कॉलेज के अकाउंट्स ऑफिस, जिसे वहां “मह्सबा” कहते थे, में मिलता था. 16  तारीख को सबको सूचित कर दिया जाता कि कि वे मह्सबा में आकर अपना अपना वेतन ले लें. मह्सबा कॉलेज परिसर में ही एक इमारत की दूसरी मंजिल पर था. यहाँ बाहर एक बरामदा था, जिस पर एक बड़ी सी मेज़ रखी होती थी. उस मेज़ पर खाकी रंग के लिफ़ाफ़े पड़े होते थे जिनमे वेतन की रकम रखी होती थी. प्रत्येक लिफ़ाफ़े के बाहर शिक्षक का नाम और रकम की राशि लिखी होती थी. वहां कोइ चौकीदार या कैशियर किस्म का कर्मचारी नहीं होता था. लोग आते, मेज़ पर पड़े लिफाफों के ढेर में से अपने नाम का लिफाफा ढूँढ़ कर किनारे को हो जाते. वहां बगल में ही एक दूसरी मेज़ भी रखी होती थी जिस पर एक रजिस्टर पड़ा होता था. उस रजिस्टर में सबके नाम और वेतन की राशि लिखी होती. लोग रजिस्टर में अपना नाम खोज कर उसके आगे दस्तखत कर देते थे. यही वेतन प्राप्ति रसीद होती थी.

बग़दाद यूनिवर्सिटी की प्रशासनिक बिल्डिंग 

       इस सारे सिस्टम को देख कर मैं बहुत ही हैरान हुआ. रुपयों से भरे लिफ़ाफ़े मेज़ पर ऐसे ही बिना किसी निगरानी के पड़े होते. लोग आते और केवल अपने ही नाम वाला लिफाफा उठाते. जब वे रकम को गिनते तो वह ठीक उतनी ही निकलती जितनी कि लिफ़ाफ़े के बाहर लिखा होता. मैंने भी अपने “पे पैकेट” में रखे नोट गिने, वे पूरे 435 दीनार निकले.

       हालांकि सब मेरे सामने ही हो रहा था पर मुझे फिर भी इस पर विश्वास नहीं आ रहा था. मैंने एक इराकी साथी से पूछा कि अगर किसी कारण पैकेट में पूरे पैसे ना निकलें तो क्या होता है. वह बोला कि कोइ बात नहीं आप अन्दर जाकर कैशियर को बता दें और वह आपको पैसे दे देगा. 

       मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई और मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा कि अगर कोइ झूठ ही कह दे? वह बोला कि इराक में ऐसा कोइ नहीं करता. मेरी अब भी तसल्ली नहीं हुई थी और मैंने पूछा कि अगर लिफाफों से किसी ने कुछ दीनार चोरी कर के निकाल लिए हों तो? इस पर वह बोला कि ऐसा आज तक तो यहाँ इस मह्सबे में नहीं हुआ है.

       उसका कहना सच था. क्योंकि जितने दिन मैं वहां रहा, ना कभी मेरे “पे पैकेट” में पैसे कम निकले और ना ही यह सुनने में नहीं आया कि किसी और के लिफ़ाफ़े में पैसे कम निकले हों या चुरा लिए गए हों या कोइ लिफाफा ही चुरा लिया गया हो. 

       आज पता नहीं वहां क्या स्थिति है पर उस वक्त सचमुच ईराक बहुत ही अच्छा देश था.