April 22, 2017

ऐसा देश जहां हम हिन्दुओं को हृदयहीन और ज़ालिम समझा जाता है.


अपने लाइबेरिया प्रवास के दौरान मुझे मैंने कुछ ऐसा सीखने को मिला जिसने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया क्या जो हम सोचते हैं वह ठीक हैं.  

मैं वहां दो साल रहा. इस अवधि में मेरे कई व्यक्तियों और परिवारों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध हो गये थे। धीरे धीरे, मेरे लाइबेरियन दोस्तों ने मेरे साथ अपना दिल खोलना शुरू कर दिया था.
एक शाम मैं एक दोस्त के घर बैठ कर अपनी और उनकी जीवन शैलियों के बारे में बातचीत कर रहे थे. मेरे मित्र की पत्नी ने मुझसे पूछा कि आप हिन्दू अपने करीबी और प्रियों के प्रति इतने क्रूर, अमानवीय और असंवेदनशील कैसे हो जाते हैं। मेरी समझ में उसकी बात तुरंत नहीं आ सकी. तो फिर उसने विस्तार से बताया कि जब भारतीय लोगों मे किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो वे एक दम उसके साथ अपने पिछले संबंधों को भूल जाते हैं और तत्काल उसके मृत शरीर को घर से बाहर निकाल कर आग के हवाले कर देते हैं। आप ऐसे व्यक्ति के शरीर को, जो वर्षों तक आपका प्रिय रहा है, जलाने के बारे में सोच भी कैसे  सकते हैं और वह भी मृत्यु के कुछ ही घंटों के भीतर? क्या यह अमानवीय नहीं है?  क्या हिंदुओं के ह्रदय में ज़रा भी संवेदनशीलता नहीं होती?


 मोनरोविआ का प्रमुख बाज़ार - ब्रॉड स्ट्रीट 

हिन्दू अंतिम संस्कार का यह पहलू मेरे मन में कभी नहीं आया था हालांकि बचपन से ही मैं मृत शरीर को घर से जल्दी से जल्दी शमशान पहुंचाने प्रक्रिया को देखता आ रहा हूँ. तो क्या यह महिला सच कह रही थी? महिला ने आगे कहा कि यहां अफ्रीका में मृत व्यक्ति के शरीर को कुछ दिनों के लिए अपने घर या मुर्दाघर में रखा जाता है. कुछ धार्मिक रस्में जैसे wake keeping आदि, पूरी की जाती हैं और फिर अंत में पूरे सम्मान के साथ मृत शरीर को दफनाया जाता है. मृतक की याद में दफनाये जाने वाले स्थान पर कब्र का निर्माण किया जाता है, जहां मृतक के मित्र और संबंधी समय समय पर जा कर फूल चढाते हैं, अगरबत्तियां और मोमबत्तियां जलाते हैं. यह क्रम कई वर्षों तक, कभी कभी दो पीढ़ियों तक जारी रहता है. मैंने उनसे कहा था कि हमारे मृतकों की याद रखने के लिए हमारे पास कुछ धार्मिक अनुष्ठान जैसे वार्षिक श्राद्ध हैं पर इससे उसकी तसल्ली नहीं हुई। उसने फिर से कहा  कि नहीं आप आप हिन्दू लोग हृदयहीन और बेरहम हो.

लाइबेरिया पश्चिम अफ्रीका का एक बहुत ही छोटा सा देश है और इस के बारे बहुत कम लोगों को पता है. पर इस देश की एक बहुत बड़ी विशेषता थी. वहां की प्रचलित मुद्रा अमरीकी डॉलर थी और जिसे देश से बाहर भेजने में कोइ भी रुकावट नहीं थी. इसलिए यह एक ऐसा स्थान था जहां पर आप अमरीका में ना रहते हुए भी अमरीकी डॉलर कमा सकते थे. इस कारण उस देश में बहुत से भारतीय व्यापारी पहुँच गए थे और वहां एक काफी बड़ा भारतीय समुदाय, जिनमे अधिकतर सिंधी व्यापारी थे, पैदा हो गया था. 

स्वाभाविक था की वहां समय के साथ मौतें भी शुरू होनी हो गयी. जब मृत शरीर को अंतिम संस्कार के लिए मोनरोविया (राजधानी) के बाहर कुछ अलग स्थान पर ले जाया गया तो स्थानीय लोगों ने उन्होंने इसका जोरदार विरोध किया और कहा कि वे अपने स्थानों के पास यह "गंदा" काम नहीं होने देंगे। इससे भारतीय समुदाय के लिए समस्या पैदा हो गयी मृतकों कि का दाह संस्कार कैसे करें?


वहां इन्डियन एसोसिअशन नाम का भारतीयों का एक संगठन भी था। अंत में, यह संगठन बीच में पड़ा और सरकार के पास इस मामले को उठाया। उन्होंने अधिकारियों को समझाया कि हिंदु धर्म की मान्यता के अनुसार  के मृत शरीर को जलाने का ही नियम है. तब सरकार ने मोनरोविया शहर के बाहर एक वीरान इलाके में एक अलग भूखंड इस काम के लिए वहां के भारतीय समुदाय को दिया’.
लेकिन महिला की बातों ने एक बार सचमुच ही मुझे सोच में डाल दिया. क्या हम हिंदु वास्तव में क्रूर हैं? 

 
 स्वीडन के एक चर्च का कब्रिस्तान 

कुछ वर्षों के बाद मुझे छः महीने स्वीडन में रहने मौका मिला. वहां हमारा निवास एक बड़े चर्च के साथ स्थित था. चर्च के परिसर में एक बड़ा कब्रिस्तान था. कब्रिस्तान और हमारे घर की दीवार सांझा थी और हम कब्रिस्तान में आते जाते लोगों को देख सकते थे. वहां सभी उम्र के स्वीडिश लोग आया करते थे. इतवार को बहुत लोग आते थे. कब्रिस्तान में चर्च की ओर से रेक (rake)\ और झाडू आदि उपकरण रखे होते थे. लोग आते, रेक या झाडू उठाते और अपने प्रियजन की कब्र के आसपास के क्षेत्र को साफ करते, कब्र पर फूल चढाते, मोमबत्तियां जलाते और प्रार्थना करते थे. उनके चेहरों ऐसा लगता कि वे बहुत ही सांत्वना महसूस कर रहे थे। यद्यपि हमारे लिए अनुभव नया था, पर मुझे और मेरी पत्नी को इन लोगों का इस तरह अपन्रे दिवंगत साथियों को याद करना बहुत ही सुखद लगा करता था.

आज तक मेरी समझ में यह नहीं आ सका है कि क्या ठीक हैं, अपनों की याद को कब्र के रूप में सहेज कर रखना या फिर मरने के बाद उनको जितना जल्दी हो सके शमशान पहुंचा कर जला देना.

आप लोग भी इस विषय पर अपनी राय देंने की कृपा करें.  

April 20, 2017

HOW THEY SOLD FRUITS AT BAGHDAD


I was in Iraq in 1980 on a teaching assignment with the University of Baghdad.  I had gone alone but my wife and two daughters also joined me later.  This was the golden period of Iraq.  Though the war with Iran had started a few weeks back, but it did not seem to have any effect on day to day life in Baghdad.  Iraqi dinar was a hard currency.  One dinar could get you 3.3 US dollars.  Today one US dollar fetches 1100 Iraqi dinars.  Iraq of those days was a very good country.  Life was very cheap.  Law and order was one of the best in the world.  Crime was virtually absent.  Saddam Husain was aiming to make it a welfare state.

It was my first visit outside India.  Youngsters of today may not imagine how India was in 1980.  “Imported goods” used to be a dream possession of everyone.  So an opportunity to visit a foreign country and that too on a paid assignment to a country like Iraq where expatriates were not only paid heavily but were also allowed to send home 75 per cent of their savings, was considered to be a great luck.  


A street fruit vendor in Iraq


Till my family had not arrived, I was living  in a hotel on a side lane of the Sadoon Street, one of the most modern and fashionable streets of Baghdad. Being in a foreign country for the first time, I used to loiter in markets in the evening looking at shops for things which I had not seen before. I also tried to talk and befriend with local people. Every day I had some new and interesting experience. 

That time was the date season in Iraq.  Before that I knew only one kind of date which we get in India.  This is the type which is exported as because of its high sugar content, it can be shipped to long distances and can also be stored for quite long.  I was surprised to see the large variety of date fruits at the shops.  I was told that in Iraq there were over one thousand different varieties of dates.


Sadoon Street of Baghdad during good old days

Being a fruit scientist, I wanted to taste as many kinds of date as possible.  However, a problem arose.  The fruit and vegetable vendors of Baghdad do not like sell less than a kilo of anything.  The other practice in that city was that customers were not allowed to touch the fruits or vegetables for making a selection as we do in India.  If some customer touched anything, the Arab shopkeeper would lose his temper and start shouting at the customer.

A small fruit hawker used to sell fruits at the gate of my hotel.  He always used to have 4-5 types of dates. When I requested him to sell 100-200 grams, he refused and looked quite angrily at me.  Though the fruits were very cheap, but still it was not possible for me to buy more as I could eat only that much at a time.  Most dates varieties have to be eaten fresh could be stored for long at room temperature.  I tried to explain hawker my limitation, but would not just listen to me.

Then I found a way.  I explained my problem to one of hotel waiters and requested him to help me to convey my point to the hawker.  The waiter told him that I was alone, lived in the hotel, had no refrigerator, was a fruit scientist teaching fruits at the University of Baghdad and therefore very much interested in tasting different varieties of dates which he was seeing for the first time.  The waiter then pleaded with hawker to sell me lesser quantity. 


At this the hawker agreed to sell me half kilo at one time.  We then requested him to give me half kilo not of a single variety but from 3-4 different varieties.  The hawker softened and agreed for that too.  So I could taste dates of many varieties grown in Iraq.

Later we became friends.  Whenever he got fruits of some new variety, he would gift me a few for tasting. 

April 17, 2017

A GREAT MEDICAL DISCOVERY



I had an opportunity of spending two years in West Africa in 1982-84.  I was working as an Assistant Professor of Horticulture at the College of Agriculture and Forestry of the University of Liberia.  I was posted at Monrovia, the capital city located on the shore of Atlantic. 

            It was my second stint outside India.  Before that I had taught for some time at the University of Baghdad.  Iraq was not very different from India.  So living there did not give you a feel of being in a foreign country but for seeing “foreign” electronic goods like transistor radios and the “two in ones” or synthetic sarees, the dream objects of common Indians during those days.  It may not be out of place to mention here the College of Agriculture was located 30 km outside of Baghdad at Abu Gharaib.  This place had become much known later during the days of American occupation of Iraq for the infamous prison run by American soldiers for their Iraqi prisoners. 

            Africa, however, is very different from India.  In fact when you are there, you really feel that you are in some “other” world.  Everything, the land, climate, people, their lifestyle is totally different than what we have been seeing in India.  You do not feel so different from India even while being England or America. So every day you learned something new, which could at times be shockingly unexpected.


With colleagues in Liberia

            In Liberia (they say that it is in many other African countries too) society is highly promiscuous.  They start indulging in sex quite early much before getting married.  Extramarital relationships are a very common practice there.  Every married person has girl friends besides wife.  As all women are from Liberia only, so it must have been the same with married women too.  This kind of life was socially accepted there.

            I had a 51 years old colleague named Mr. Kiao.  He was the manager of our college farm. As he was a senior person (I was 42 at that time), so I often used to sit with him and talk on various subjects.  One unusual thing which I had noticed about Mr. Kiao was that I often found him drinking Guinness Stout Beer (a very strong beer) in his office during duty hours.

            I also used to talk with him about Liberian culture including promiscuosity in Liberian society.  As it was much unheard for Indians, so we Indians in Liberia always found this subject interesting.  Mr. Kiao, however, always defended it.

            One day when both of us were talking on the same subject, Mr. Kiao said, “It is now established in medical science that if you continued living with the same woman, you become impotent in two years”.  So according to him having relationships outside marriage in Liberian society did not mean any disloyalty to spouse.  It but was rather a “health requirement”.  He further told that he loved his wife very much and so did she. But if he or she had relationships outside marriage, it was not for fun but keeping themselves fit.

            I told him that it was not true. Had it been true, India would have been a nation of impotent men.  But I could not convince him and many others like him in my circle of Liberian friends.

            What a great medical discovery!