August 20, 2017

बग़दाद यूनिवर्सिटी में मिला करते थे सचमुच के "पे पैकेट"



सन 1980-81 में मुझे भारत सरकार के फौरेन अस्साइनमेंट सैक्शन के द्वारा बगदाद विश्वविद्यालय के कृषि कॉलेज मे नौकरी करने का अवसर मिला था. मैं वहां हौरटीकल्चर का असिस्टैन्ट प्रोफ़ेसर नियुक्त हुआ था. 

उस समय इराक़ अपनी आर्थिक समृधि की उच्चतम सीमा पर था. तब एक इराकी दीनार के 3.3 अमरीकी डॉलर मिल जाया करते थे जबकि आज एक अमरीकी डॉलर लेने के लिए इराकियों को 1185 दीनार देने पड़ते हैं. इस से ही आप यह अंदाज लगा सकते हैं कि इराक़ पिछले 35-36 कहाँ से कहाँ पहुँच गया है. जब मैं वहा पहुंचा, तब ईरान-ईराक युद्ध को शुरू हुए दो महीने हो चुके थे पर तब तक इस युद्ध का लोगों के दैनिक जीवन पर कोइ असर नहीं पडा था. दैनिक उपयोग की सब चीजें ना केवल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध ही थीं पर बहुत सस्ती भी थी. ये वो दिन थे जब भारत में एक अच्छा रेडिओ कैसेट प्लेयर भी एक साधारण भारतीय यूनिवर्सिटी अध्यापक कया ड्रीम पोजेशन हुआ करता था. वी सी आर तब शुरू ही नहीं हुए थे. इसलिए उन दिनों जिसको इराक में नौकरी मिल जाती थी, उसे भाग्यशाली समझा जाता था.
उस समय के बग़दाद शहर का एक दृश्य

        ईराक़ी सरकार विदेशी प्रोफेसरों को बहुत अच्छा वेतन देती थी. एक पी एच डी प्रोफ़ेसर का मूल वेतन 400 दीनार था और इसमें पांच दीनार प्रतिवर्ष उसके शैक्षणिक अनुभव के जोड़े जाते थे. इस हिसाब से मेरा मासिक वेतन 435 दीनार तय हुआ था जो 1435 अमरीकी डॉलर यानि उस समय के हिसाब से लगभग 11,000 भारतीय रुपयों के बराबर था. तब सोलन के कृषि कॉलेज में जहां मैं पढाता था, में मेरी तनख्वाह 1100 रुपये भी नहीं थी. इसलिए मेरे लिए यह छप्पर फाड़ रकम थी. फिर इराक़ में कोइ इनकम टैक्स आदि भी नहीं था. उस पर एक बड़ी सुविधा यह भी थी कि विदेशी कर्मचारी अपने वेतन का 75 प्रति भाग मनचाही मुद्रा में वापस अपने देश ले जा सकते थे. ईराक में उस समय जीवन यापन बहुत ही सस्ता था और अच्छी तरह  रहकर भी आप आसानी से अपनी आधी तनख्वाह बचा लेते थे. अनेक लोग तो पूरा 75 प्रतिशत भी बचा लिया करते थे. मेरे पहुँचने के कुछ सप्ताह बाद मेरी पत्नी और दोनों बेटियां भी मेरे साथ रहने बग़दाद आ गयीं थी.

        वहां वेतन महीने की पहली तारीख को नहीं बल्कि पिछले महीने की 16 तारीख को दिया जाता था. यानि जनवरी का वेतन 16 दिसंबर को मिल जाता था. उनका वेतन देने कया तरीका भी बहुत ही अलग था. असल में वेतन भुगतान का ऐसा तरीका मैंने केवल इराक में ही देखा है हालांकि मैंने भारत से बाहर कुछ और देशों में भी काम किया है. 

बग़दाद यूनिवर्सिटी का कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर,
                                                               जहां मैं काम किया  करता था.
इराक़ में वेतन के “पे पैकेट” दिए जाते थे. इस से पहले मैंने पहले "पे पैकेट" शब्द केवल सुना या पढ़ा ही था. मेरा विचार था कि “पे पैकेट” सिर्फ एक व्यावसायिक शब्द या मुहावरा ही है। सचमुच के पे पैकेट भी हो सकते हैं, यह मैंने बग़दाद में ही देखा.

       शिक्षकों को वेतन कॉलेज के अकाउंट्स ऑफिस, जिसे वहां “मह्सबा” कहते थे, में मिलता था. 16  तारीख को सबको सूचित कर दिया जाता कि कि वे मह्सबा में आकर अपना अपना वेतन ले लें. मह्सबा कॉलेज परिसर में ही एक इमारत की दूसरी मंजिल पर था. यहाँ बाहर एक बरामदा था, जिस पर एक बड़ी सी मेज़ रखी होती थी. उस मेज़ पर खाकी रंग के लिफ़ाफ़े पड़े होते थे जिनमे वेतन की रकम रखी होती थी. प्रत्येक लिफ़ाफ़े के बाहर शिक्षक का नाम और रकम की राशि लिखी होती थी. वहां कोइ चौकीदार या कैशियर किस्म का कर्मचारी नहीं होता था. लोग आते, मेज़ पर पड़े लिफाफों के ढेर में से अपने नाम का लिफाफा ढूँढ़ कर किनारे को हो जाते. वहां बगल में ही एक दूसरी मेज़ भी रखी होती थी जिस पर एक रजिस्टर पड़ा होता था. उस रजिस्टर में सबके नाम और वेतन की राशि लिखी होती. लोग रजिस्टर में अपना नाम खोज कर उसके आगे दस्तखत कर देते थे. यही वेतन प्राप्ति रसीद होती थी.

बग़दाद यूनिवर्सिटी की प्रशासनिक बिल्डिंग 

       इस सारे सिस्टम को देख कर मैं बहुत ही हैरान हुआ. रुपयों से भरे लिफ़ाफ़े मेज़ पर ऐसे ही बिना किसी निगरानी के पड़े होते. लोग आते और केवल अपने ही नाम वाला लिफाफा उठाते. जब वे रकम को गिनते तो वह ठीक उतनी ही निकलती जितनी कि लिफ़ाफ़े के बाहर लिखा होता. मैंने भी अपने “पे पैकेट” में रखे नोट गिने, वे पूरे 435 दीनार निकले.

       हालांकि सब मेरे सामने ही हो रहा था पर मुझे फिर भी इस पर विश्वास नहीं आ रहा था. मैंने एक इराकी साथी से पूछा कि अगर किसी कारण पैकेट में पूरे पैसे ना निकलें तो क्या होता है. वह बोला कि कोइ बात नहीं आप अन्दर जाकर कैशियर को बता दें और वह आपको पैसे दे देगा. 

       मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई और मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा कि अगर कोइ झूठ ही कह दे? वह बोला कि इराक में ऐसा कोइ नहीं करता. मेरी अब भी तसल्ली नहीं हुई थी और मैंने पूछा कि अगर लिफाफों से किसी ने कुछ दीनार चोरी कर के निकाल लिए हों तो? इस पर वह बोला कि ऐसा आज तक तो यहाँ इस मह्सबे में नहीं हुआ है.

       उसका कहना सच था. क्योंकि जितने दिन मैं वहां रहा, ना कभी मेरे “पे पैकेट” में पैसे कम निकले और ना ही यह सुनने में नहीं आया कि किसी और के लिफ़ाफ़े में पैसे कम निकले हों या चुरा लिए गए हों या कोइ लिफाफा ही चुरा लिया गया हो. 

       आज पता नहीं वहां क्या स्थिति है पर उस वक्त सचमुच ईराक बहुत ही अच्छा देश था.

2 comments:

  1. रोचकता के साथ एक देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन का सूक्ष्म अध्ययन.

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  2. धन्यवाद, भविष्य में भी निष्पक्ष और क्रिटिकल कमेंट्स देते रहें ताकि मैं अपने लेखन को ज्यादा रोचक बना सकूं. वैसे मैंने एक निर्णय यह लिया है कि हिन्दी में ही लिखा करूंगा क्योंकि मैंने यह मेसूस किया कि हनी में लिखे इन लेखों को अधिक लोग पढ़ते हैं. आपको जान कर शायद आश्चर्य हो कि मेरी पिछली पोस्ट को 12,700 लोग पढ़ चुके हैं जो आज तक सबसे ज्यादा है. मुझे तो खुद ही विश्वास नहीं हो रहा है.

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