January 28, 2019

अमरीका, ब्राज़ील और हाँगकाँग के ट्रामवेयों से अच्छा हो सकता है हिमाचल का जोगिंदर नगर बरोट ट्रामवे


कुछ दिन पहले जोगिंदरनगर से बरोट तक चलने वाले ट्रामवे की दुर्दशा के बारे में एक लेख पढ़ा। मुझे कोई 7-8 वर्ष पहले इस ट्रामवे पर जोगिंदर नगर से विंचकैम्प तक जाने का अवसर प्राप्त हुआ था। यह ट्रामवे वास्तव में ही बहुत बदहाली में है। जो ट्रामें, जिनको अधिकतर स्थानीय लोग ट्राली या ट्रक कह कर पुकारते हैं, यहाँ चल रही हैं, ये शानन पावरहाउस के निर्माण के समय 1930 में लायी गई थीं और शुक्र है कि ये अभी तक भी चालू हालत में हैं। वैसे इनकी सवारी और बैल गाड़ी की सवारी में कोई विशेष अंतर नहीं है। जिस दिन मैं जा रहा था, उस दिन सौभाग्य से पंजाब बिजली बोर्ड के यहाँ काम कर चुके एक वरिष्ठ सेवा निवृत्त इंजीनियर भी बरोट जा रहे थे। उनके आराम के लिए उनके साथ जा रहा कनिष्ठ अधिकारी एक रूई का गद्दा ले आया था। इस गद्दे को लकड़ी के तख्ते वाली सीट पर बिछा दिया गया। इस तरह मुझे और मेरी पत्नी को भी जाती बार नरम सीट बैठने को मिल गई।

      यह ट्राली बेशक बैल गाड़ी जैसी थी, पर चलने में ठीक थी और हमें विंचकैम्प तक पहुँचने में कोई रुकावट नहीं आई। एक लोहे की रस्सी के दोनों सिरों पर दो ट्रालियाँ जुड़ी होती हैं।  जब ऊपर बिजली की मोटर चलाई जाती है तो एक ट्राली रेल की पटरी जैसी पटरी पर ऊपर जाती है और वैसी ही एक दूसरी ट्राली ऊपर से नीचे आती है। ठीक बीच मे पटरी द्विशाखित हो जाती हैं और दो पटरियों में परिवर्तित हो जाती हैं और दोनों ट्रालियाँ अलग अलग पटरी पर चलने लगती हैं। बाद मे दोनों पटरियाँ फिर मिल कर एक हो जाती हैं। जब ये ट्रालियाँ दो पटरियों पर एक दूसरे को क्रॉस करती हैं, तो यह दृश्य बहुत ही आश्चर्यजनक और सुंदर लगता है। यह ट्राली होती तो एक चलने वाली गाड़ी ही है, पर इसमे न तो कोई इंजन होता है, ना ही स्टियरिंग और ना ही कोई ब्रेक।  हाँ ड्राइवर जरूर होता है जिसके हाथ में तांबे की एक लंबी छड़ होती है। पटरी के साथ साथ खंभों पर बिजली तार लगे होते हैं। अगर ड्राइवर को बीच में कहीं ट्राली रोकनी पड़ जाये तो वह उस तांबे की लंबी छड़ को खंबों से जाती बिजली की तारों से छू देता है जिसके परिणामस्वरूप ऊपर मोटर के नियंत्रण कक्ष में एक घंटी बजती है और मोटर को चलाने वाला मोटर का स्विच बंद कर देता है और ट्राली रुक जाती है। इसी तरह ट्राली को फिर से चलाने के लिए वह फिर घंटी बजा देता है। बीच में एक स्टेशन आता है जहां आपको पहली ट्राली से उतर जाना होता है और फिर दूसरी ट्राली में बैठ जाना होता है।

      यह सारा सफर बहुत ही रोमांचक, आनंदनीय और मैं तो कहूँगा अविस्मरणीय अनुभव है। बेशक आपकी यह सवारी डिजाइन और सुविधाओं में बैलगाड़ी जैसी ही है। रास्ते में बिलकुल सीधी चढ़ाई आती है। आप जंगल में से होकर भी गुजरते हैं। ऐसा कुछ कुछ अनुभव आपको अमरीका के डिज़्नीलैंड में पटरी पर चलाने वाली छोटी छोटी कारों के सफर में होता है। पर वहाँ तो सब जंगल पहाड़ बनावटी हैं जबकी इस ट्रामवे पर सब कुछ असली है।   

सैन फ्रांसिस्को शहर के बीचों बीच चलने वाली विश्व प्रसिद्ध केबल कारें 

      इस अत्यंत रोमांचक सफर के बाद मेरे मन में यह विचार आया कि हमारी सरकार इस ट्रामवे में थोड़ा सा सुधार कर के इस को पर्यटकों के लिए क्यों नहीं खोल देती। अगर ऐसा कर दिया जाए तो जोगिंदर नगर इलाक़े के पर्यटन व्यवसाय में बहुत ही वृद्धि हो सकती है। इस किस्म की सुविधा सारे भारत में कहीं नहीं है। लोग सुबह बरोट जाकर शाम को वापिस आ सकते हैं या चाहें तो वहाँ भी रुक सकते हैं। 
हाँग काँग में विक्टोरिया हिल को जाने वाली केबल कार 

      मैंने विदेशों में इस किस्म की ट्राली केवल तीन स्थानों पर देखीं हैं और सभी जगह यह पर्यटकों में बहुत लोकप्रिय हैं।  पहली हाँगकाँग, दूसरी अमरीका के सैन फ्रासिस्को तथा तीसरी ब्राज़ील के शहर रियो डि जनेरो में। हाँगकाँग में तो यह बिलकुल सीधी चढ़ाई चढ़ कर विक्टोरिया हिल नामक पहाड़ी पर पहुँच जाती है। पहाड़ी से हाँगकाँग शहर और बन्दरगाह का दृश्य बहुत ही सुंदर दिखता है।  लोग वहाँ आधा पौना घंटा रुकते हैं, रेस्तराओं में खाते पीते हैं और बतौर निशानी एक आध चीज खरीद कर नीचे लौट आते हैं। यह अनुभव जोगिंदरनगर के ट्रामवे के मुक़ाबले में कुछ भी नहीं हैं।
यह ट्रेन नुमा कार आपको ब्राज़ील के शहर रियो डि जनेरो की विश्वप्रसिद्ध ईसा मसीह की मूर्ति पर ले जाती है 

      सैनफ्रांसिस्को की ट्रालियों को वहाँ केबल कार कहते हैं। ये शहर के एक भाग से पहले ऊपर पहाड़ी पर चढ़ती हैं और फिर शहर के दूसरी ओर उतराई उतर कर नीचे समुद्री खाड़ी के किनारे, फ़िशरमैनज़ व्हार्फ आती हैं। सैनफ्रांसिस्को की केबल कारें उस शहर का एक प्रमुख आकर्षण और प्रतीक भी हैं।   

      रियो डे जनेरो में चलने वाली ट्राली को भी वे केबल कार ही कहते हैं।  यह पर्यटकों को नीचे शहर से पहाड़ी  के ऊपर जहां रियो डे जनेरो की ईसा मसीह (Christ the Redeemer) की  विश्व प्रसिद्ध मूर्ति है, वहाँ ले जाती है। यह दूरी काफी है और केबल कार जंगल से हो कर गुजरती है। ऊपर जाते हुए रियो डे जनेरो शहर तथा उसके समुद्र तटों का दृश्य बहुत ही मनमोहक लगता है।  क्योंकि यह स्थान ताजमहल के मुक़ाबले का पर्यटक स्थल है, इस लिए यहाँ हजारों लोग रोज आते जाते हैं।

      हमारी सरकार को जोगिंदर नगर के ट्रामवे को हाँग काँग या रियो डे जनेरों की तर्ज पर विकसित करना चाहिये।  यहाँ सब कुछ बना बनाया है। केवल कुछ सुधार की आवश्यकता है।  फिलहाल पुरानी ट्रालियों ही उपयोग में लायी जा सकती है। इस से जोगिंदर नगर, ऊपर विंचकैंप, बरोट आदि स्थानों में पर्यटन व्यवसाय में क्रान्ति लाई जा सकती है।

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