February 28, 2021

जिस दिन मैं खुशवंत सिंह से मिला

 मुझे जीवन में सबसे अधिक वो लोग प्रभावित करते रहे हैं जो अपनी बढ़ती उम्र के बावजूद भी काम करना नहीं छोड़ते और अपने काम में पूर्ववत लगे रहते हैं। 

स्वर्गीय खुशवंत सिंह भी एक ऐसे ही व्यक्ति थे। 99 साल के होने बाद भी उन्होंने लिखना जारी रखा और ऐसा कुछ लिखा जिसके छपने का उनके लाखों पाठक उत्सुकता से प्रति सप्ताह इंतजार किया करते थे। मैं भी उन पाठकों में से एक था। पिछले कई दशकों से मैं उनके कालमों का नियमित पाठक रहा हूँ। मैंने उनके सभी उपन्यास, आत्मकथा तथा संस्मरणों के संग्रह पढे हैं। उनकी जिस बात का मैं सबसे ज्यादा कायल रहा हूँ, वह थी इतनी ज्यादा उम्र में भी उनके काम करने की क्षमता।  

मेरी बहुत बड़ी इच्छा थी कि एक बार उनसे मिल कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करूं। इसके लिए मैंने उन्हें कई बार पत्र लिख कर समय मांगा। पर उनका हमेशा यही उत्तर आता रहा कि सेहत ठीक न रहने पर उन्होंने लोगों से मिलना बिल्कुल बंद कर रखा है। पर मैंने भी हार नहीं मानी। मेरा जब भी किसी काम से दिल्ली जाना होता तो मैं उनको मिलने के लिए पत्र लिख देता था। यह सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा। अंत में वो पसीज गए और और उन्होंने मुझे मिलने का समय दे दिया पर साथ में यह शर्त भी लगा दी कि वे मुझसे केवल एक मिनट बात करेंगे। 

यह 14 सितंबर 2010 का दिन था। मैं उस दिन इंग्लैंड जा रहा था। मेरी फ्लाइट शाम की थी और इसके लिए मुझे  शाम पाँच बजे हवाई अड्डे पर पहुंचना था। खुशवंत सिंह लोगों से हमेशा 6 बजे ही मिला करते थे। मुझे यह बात पता थी। इसलिए मैंने उनसे यह विशेष अनुरोध किया था कि वे मुझे 3 बजे का समय दें ताकि मैं समय पर हवाई अड्डे पहुँच सकूँ। वह मान गए और उन्होंने मुझे आने को कह दिया। 

मैं 13 सितंबर को मंडी से निकाल पड़ा था। उनका पोस्ट कार्ड (खुशवंत सिंह उत्तर हमेशा पोस्ट कार्ड पर दिया करते थे और वह भी हाथ से लिख कर)। मेरी पत्नी ने जैसे ही उनका वह पोस्ट कार्ड पढ़ा, मुझे फोन पर बताया कि खुशवंत सिंह मुझसे मिलने को मान गए हैं और उन्होंने मुझे अपने घर 3.30 बजे आने को कहा है, साथ में यह भी बताया कि वह मुझसे सिर्फ एक मिनट ही बात करेंगे। उस समय मैं बस में बैठा था। यह समाचार पाकर मेरी प्रसन्नता का पारावार नहीं रहा। 

खुशवंत सिंह का वह पोस्ट कार्ड 

अगले दिन मैं ठीक साढ़े तीन बजे उनके घर पर पहुँच गया। उनके नौकर ने दरवाजा खोला, मुझसे पूछताछ की और अंदर जाकर उनको बताया। खुशवंत सिंह ने मुझे अंदर बुलाया लिया। मैं उनके कमरे में दाखिल हुआ। खुशवंत सिंह एक सोफ़े पर बैठे थे। उनकी बगल में एक मेज था जिस पर जिस पर किताबें कागज आदि बिखरे थे, उन्होंने सिर पर पगड़ी या पटका नहीं पहना था। मैंने उनके पैर छूए, उन्होंने हाथ हिला कर मेरा प्रणाम स्वीकार किया और मुझे बैठने को कहा। मैं बगल में रखे दूसरे सोफ़े पर बैठ गया। पता नहीं शुरू में ही उम्र की कोई बात चली और मैंने उनको बताया कि मेरे पिता जी 97 साल से अधिक जीवित रहे थे तो उन्होंने तुरंत अंग्रेजी में पूछा, हाऊ वाज़ ही। मैंने उनको पिताजी के बारे में बताया और हम कुछ देर तक इस विषय पर  बात करते रहे। 

फिर उन्होंने मुझसे मेरे काम के बारे में पूछा। जब मैंने उनको बताया कि मैं पिछले तीन दशकों से पहाड़ों में पाए जाने वाले जंगली फलों पर शोध करता रहा हूँ और मैंने इस विषय पर एक पुस्तक, एक सीडी और अनेकों लेख भी लिखे हैं तो मेरे विषय के चुनाव पर थोड़े हैरान हुए और और पूछा कि मैं अपनी रिसर्च के लिए जंगली फल ही क्यों चुने। मैंने उनको इसका कारण समझाया। खुशवंत सिंह एक प्रकृति प्रेमी व्यक्ति थे और पेड़ पौधों  के बारे में जानकारी रखते थे। वे जंगली पहल आकखे और दाड़ू आदि के बारे में भी जानते थे क्योंकि वे अपने बचपन और जवानी के दिनों में  शिमला में रहे थे। बाद मे कसौली में भी उनका घर हो गया था, जहां वे वर्ष में कुछ महीने अवश्य बिताया करते थे।  फिर मैंने उनको अपनी वन्य फलों के बारे में तैयार की गई सीडी भेंट की। उसके बाद कुछ क्षण वे चुप रहे और फिर कहने लगे कि मैं उनको अपना संक्षिप्त जीवन परिचय तथा एक चित्र दूँ। मेरे पास उस समय यह उपलब्ध नहीं था। वे बोले कि इंग्लैंड से लौटने पर भेज दूँ। हमे बात करते हुए 15 मिनट हो गए थे। 


मैं और खुशवंत सिंह 

मैंने उनके साथ एक चित्र लेने की इच्छा प्रगट की। वे तुरंत मान गए और मुझे अपने सोफ़े की आर्म पर बैठने को कहा। मुझे उनके बराबर, बल्कि कुछ ऊंचा ही, बैठना अच्छा नहीं लगा। इसलिए मैं नीचे फर्श पर ही बैठा। फिर मैंने उनसे विदा ली। जब मैं दो सप्ताह बाद भारत वापस लौटा तो मैंने अपना जीवन परिचय और चित्र उनको भेजा। उन्होंने अपने अगले सप्ताह के कालम में मेरे और मेरे काम के बारे में लिखा था। 

खुशवंत सिंह से मिलना  और उनके साथ कुछ समय बिताना मेरे जीवन के मेरे सुखमतम और सबसे प्रेरणादायक अनुभवों में से एक है। मैं उन क्षणों को कभी भी नहीं भूल सकूँगा। उस समय उनके साथ बैठ कर  मुझे ऐसा लगा कि जैसे मुझ में किसी विचित्र शक्ति का संचार हो गया है। 

खुशवंत सिंह का स्वभाव था कि वह अपने पाठकों के पत्रों का उत्तर अवश्य देते थे और ये उत्तर पोस्ट कार्डों पर उनके अपने हाथों से लिखे होते थे। मैंने उनके द्वारा लिखे हुए सभी पोस्ट कार्डों को संभाल कर रखा है।  

पाँच साल  बाद 2015 में मुझे कसौली में आयोजित खुशवंत सिंह लिट फेस्ट में भाग लेने का अवसर मिला। उस समय मैंने उनका कसौली का घर और उनकी पुस्तकों का संग्रह भी देखा। यह भी मेरे लिए उतना ही  रोमांचक अनुभव था। मैंने उनके घर पर कुछ चित्र भी लिए। उनमें से तीन चित्र यहाँ दे रहा हूँ। 


मुख्य सड़क से खुशवंत सिंह के घर "राज विला" को मिलाने वाली सड़क का प्रवेश द्वार 


राज विला का प्रवेश द्वार 


राज विला का एक कमरा